संपादकीय

नेह क थाती - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

उसर भइल नेह क थाती 
कहवाँ हेरी आपन माटी।
धावल धुपल गाँव पहुचलीं 
मुँह बनवले मिलल संघाती।

बिला गइल हवा क खुसबू 
पीपरो के छांह नदारत बा।
सउसें कचरा भरल मन 
दिल में दरार पारत बा। 

दुअरा न बाबा मिललें 
घरे न दिखलिन दादी।
चहक दिखल न कतहूँ 
दिखल सउनाइल खादी।
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अंक - 79 (10 मई 2016)

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