विविध

अंक - 23 (14 अप्रैल 2015)

राहुल सांकृत्यायन विशेषांक

कुछ लोग अइसन होला जिनकरा के हमेसा ही महसुस कइल जा सकेला। चाँहे ऊ आस-पास होखस चाँहे ना। हर आदमी के जिनगी में एकाध लोग अइसन मिल जालें। ठीक ओइसहीं हर समाज में कुछ लोग अइसन होला जिनकर छाँह हमेसा समाज के मिलत रहेला। महापण्डित राहुल सांकृत्यायन एगो ओइसने मनई रहल बानी जिहाँ के आज हमनी के बीच देहि से तऽ नइखी लउकत लेकिन केवनो ना केवनो रुप में संगे बाड़ीं। उहाँ के भोजपुरी खाती कईल काम कबो भोजपुरी साहित्य ना भूला सकेला।
केवनो आदमी के निर्मान में ओकरा समाज औरी परिवेस के बहुत बड़हन जोगदान होला। ऊ समाज औरी परिवेस जेवना में आदमी शुरूआती जिनगी बीतावेला ऊ जाने अनजाने सगरी जिनगी साथ निभावेला औरी जब ई बात ऊ आदमी के बुझाला तऽ ऊ मनई कोसिस करेला कि ओ माटी के मिठास अपनी औरी दूसरी के जिनगी धोर सके। लागता इहे बात राहुल की के संगे भी रहे। जब उहाँ के सगरी दुनिया देख लिहनी; मन के हिसाब जी लिहनी औरी पढ लिहनी; तऽ सगरी चीझ वोल्गा से चलि के गंगा तक आ गईल। ई उहे काल रहल बा जब उहाँ के झुकाव ओ महक के ओर घुमल जेवना से उहाँ के जनमनी औरी ऊ झुकाव आ लगाव आठ गो नाटक औरी नयकी दुनिया नाँव के साहित्यिक रचना में हमनी सोझा आइल। जेङने उहाँ अपनी नाटकन में भोजपुरिया समाज के देखवले बानी उ बतावत बा कितना भीतर ई माटी उहाँ में समाईल बे औरी उहाँ के ओके महसुस भी करत बानी। औरी सायद इहे कारन बा कि आज भी उहाँ नाटक नया लागेला।
ए अंक उँहा के एगो नाटक जोंक भी परस्तुत बा। केतनो कहब कम परी एसे इतने कहि के उहाँ के जनम दिन जेवन 8 अप्रैल के परेला तऽ 14 अप्रैल के दिने इहाँ ई दुनिया छोड़ले रहनी, हमनी के ई अंक के समर्पित कऽ के उहाँ के आपन श्रद्धा सुमन चढावत बानी जा।
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साहित्य कबो लोक से अलगा ना हो सकेला। संभवे नईखे। एसे साहित्य खाती ई बहुत जरूरी बा ऊ अपना लोक, समाज, संस्कार औरी संस्कृति के नाथि के चलो जेसे कि ऊ सभ परम्परन क ना खाली जिन्दा राखे में आपन जोगदान कऽ सके बल्कि ओकरी विकास में सङवई बन सके। संगही ऊ ओ बात औरी कमी के भी सोझा ले आवे के कोसिस करे ताकि ओमें जुग के हिसाब से बदली आ सके जेसे कि केहू जिनगी के भागा-भागी में पीछे ना छूट जाए।  ई एगो साहित्य सेवी के जिम्मेवारी औरी कर्तव्य दूनू बा।
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ई दुनिया बड़ बे; बहुत बड़ औरी एतहत बड़हन दुनिया में जाने केतने लोग बाड़ें औरी जाने केतने लोग पहिलहूँ ए दुनिया में रहल बाड़ें लेकिन कुछ नाँव लोगन के मन में ए तरे घुस जाला कि ओकरा खाती समय के केवनो मतलब ना रह जाला। औरी ओह हाल में बकत आपन हाथ-गोड़ तुरि के बइठ जाला। चुपचाप। अइसन लोगन क नाँव औरी काम एक पीढी से दूसरकी पीढी ले बिना केवनो हील-हौल पहुँच जाला।
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जोंक - राहुल सांकृत्यायन
हे फिकिरिया मरलस जान।
साँझ बिहान के खरची नइखे, मेहरी मारै तान।।
अन्न बिना मोर लड़का रोवै, का करिहैं भगवान।। हे॰।।

करजा काढि़-काढि़ खेती कइली, खेतवै सूखल धान।।
बैल बेंचि जिमदरवा के देनी सहुआ कहे बेईमान।। हे॰।।
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अगर एह सबद के अर्थ एगो वैचारिक अस्तर प देखल जाओ त इ सबद क बड़ा बरियार आ गूढ़ माने निकलत बा। जदि एह सबद के परिभाषा देखल जाओ त 'गतिशीलता' एकर मुख्य आसय होई, जवन जीवन में कब्बो रुके के ना कहेला।
जिनगी के जियल आ ओकर जतरा कईल दुनु अलग-अलग पक्ष बा 
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दाँत बनवावे भुअर डाॅक्टर लगे गईले
एगो दाँत के बनवाई एक हजार फरमईले।
बेसी बनवईला पर कुछ छूट हो जाई
हऽ आई ओही दाम में चार गो बन जाई।
बटुआ टो टा के भुअर भईले तईआर
दाँत बनावे के डाॅक्टर निकलले औजार।
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विकास - चन्द्रभूषण पाण्डेय

एगो शब्द बा "विकास"। एह शब्द के कवनो शब्दकोश के शब्दावली में कुछुओ मतलब होखत होखे कवनो फरक न ईखे पडत। बाकी राजनीतिक शब्दावली में एकर मतलब होला "पुष्पक विमान"। ई ऊहे विमान ह जेकरा के द्वापर,त्रेता,भा सतयुग में मंत्र के बल प प्रकट करावल जात रहे आउर मंत्रे के बल प जी०पी०एस० मोड में डाल के जहवा मन करत रहे ओहीजे उतार लियात रहे भा चढा दियात रहे, बाकी दोसरा के छान्ही-खपडवा बचा के।
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जहिया के थरिया
उधारी भइल अब दुपहरिया,
ए करिया भाई !
हमहू जाईब ताबड़तोड़ झरिया।

रेहवा बिकात नईखे
भूखवा सहात नईखे
जाईबी संग सघंतिया।
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मंहगाई - जगदीश खेतान
का ईहे कहाई मंहगाई।
तनी बतलईब मंहगू भाई।।
दादा जब हमरे पढत रहें
खुद अपने मुंह से कहत रहें।
खडिया दवात मे घोर घोर
पटरी पर अक्षर गढत रहें।
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