संपादकीय

जोंक - राहुल सांकृत्यायन

प्रमुख पात्र
नोहर राउत - मुखिया

बुझावन महतो - किसान

सिरतन लाल - जिमदार के पटवारी


(गीत गावल जात बा)

हे फिकिरिया मरलस जान।
साँझ बिहान के खरची नइखे, मेहरी मारै तान।।
अन्न बिना मोर लड़का रोवै, का करिहैं भगवान।। हे॰।।

करजा काढि़-काढि़ खेती कइली, खेतवै सूखल धान।।
बैल बेंचि जिमदरवा के देनी सहुआ कहे बेईमान।। हे॰।।

(बुझावन महतो एगो फाटल-मइल धोती पहिरले खड़ा बाड़े। एह घरी नोहर राउत के आँखि बुझावन महतो के फिल्ली पर पड़ल, ऊ झट से फिल्ली से कौनो चीजु नोच के बुझावन से कहलें )

नोहर ः हई देखा बुझावन महतो।
बुझावन ः (थथमि के) नोहर भाई! फेंकऽ होने, फेंकबो करबो, हमरा पंजरा ः जनि लेआवा, का दू करिया-करिया हिलता।
नोहर ः तोहरे फिल्ली में से निकलनी हाँ, देख नु हई गोड़। लोहूलोहन भइल बा। ना जानी केतना बेरि से लागल रहल हा।
बुझावन ः (खून से समुच्चा फिल्ली के भीजल देखि के) जोंक
लागल रहल हा, नोहर भाई! हमार माथा घूमताऽ (बइठि गइले।)
नोहर ः (बइठिके घाव के मुँह अँगुरी से दाब के) भइंसवा जोंक
हा, बुझावन। आपन मतलब क चुकल बा। हो देखऽनु अउँठा कइसन मोट बा।
बुझावन ः ओकरा ओर देखे के मन नइखे करत। पाव भर खून पियले होई नोेहर भाई?
नोहर ः ना, पाव भर ना, पाव भर बहुत होला, मुदा कनवा
छटाँक से का कम होई। केतना त खून बहि गइल हा। तोहरा मालूम ना भइलह बुझावन?
बुझावन ः जोंकि के लागल ना नु मालूम होखे। हम पोखरा में भइसिया के धोवली हाँ, मिगडाह नु तपल बा, रोहिनी के पानी बरिसि गइल बा, से पोखरवा में नयका पानी
बहुत बा,नयका पानी में ना जाने कहाँ से छैंटी के छैंटी
जोंक ऊपर भइल बाड़ीसन्।
नोहर ः तोहरा तनिको ना बुझाइल हा?
बुझावन ः ना नोहर भाई! हम अपना भइंसिया के ढोढ़ी से चारिगो जोंक निकारि के बिगले रहली हँ, बाकी हमरा ई ना पता रहल ह कि हमरो जोंक लागल बा।
नोहर ः अदिमी के खून मीठ होला बुझावन! ऊ एक कनवा पी के मोटाइल बा। हम फेंकि देनी, देख इतना पिअलेवा कि मुंह से खून निकरि रहल बा। मुदा पाकी ना, लोग कहेला कि जोंकि के काटल घाव पाके ना।
बुझावन ः साचे नोहर भाई! नाहीं त हमार भइंसिया त सरि के मुई गइल रहित, रोजे ओकरा देहि से चार गो पाँच गो बीगीले। भगवान एहनी के काहे के बनौले।
नोहर ः हमनी के देहि में जम्मा-पूंजी नवँ सेर खून बतावल जाला।
बुझावन ः त एक्कै कनवा निकरला से कपार में घुमरी काहे आवेले नोहर भाई?
नोहर ः घुमरियै के पूछत बाड़ा, बेसी खून गिरि गइला पर अदिमी मरि जाला। गोड़ के मोटकी नस काटि द, जे खून ना बन्न होई, त अदिमी मर जाई। दुई मन के समुच्चा देहि में उहै नौ सेर खून फइलल बा।
बुझावन ः छोड़ द नोहर भाई अब बन्न हो गइल होई।
नोहर ः {हाथ हटा के} हाँ खून बन्न हो गइल।
बुझावन ः {उठि क जोंक पर हुमचि-हुमचि के पाँव छ-ऐड़ी मार के} नोहर भाई! देखा केतना खून बहता, ई जोंकिया सुटुकि के पातर हो गइल, बाकी मुअल ना।
नोहर ः जोंकि के जिउ बड़ा कठकरेजी होला। बुझावन! ऊ जल्दी ना ना मूवै।
बुझावन ः हाँ नोहर माई! लोग त कहेला कि सुखा के पीस के फेंक दीहल जाय, तबहूँ बरखा के पानी बरसते जोंक फेनु जी जाले।
नोहर ः ई हमरा नईखे मालूम, बाकी जोंकि बड़ कठकरेजी होले,ई देखते बाड़।

{गाँव के पटबारी सिरपर लाल टोपी-निरजई पहिरले, कान में कलम खोंसले अइलें।}

बुझावन ः सलाम देवान जी! कहाँ घुमतानी?
सिरतन ः मालिक के दु मन घिउ, पाँच मन दही, दु गाड़ी कटहर केतना कुली दे के अबगे बिदा कइनी हाँ, तीन दिन से परसान-परसान रहनी हाँ, बुझावन महतो! आज इहै जाके साँस लेहनी हाँ।
बुझावन ः देवान जी! ई पँच-पँच मन दही, दु-दु गाड़ी कटहर एगो खस्सी हमहूँ देहनी हाँ, फेनु सुनतानी गाँव के बाहर गो खस्सी आउर गइल हा, मालिक के छगो परानी ई कुलि लेके का करीहै?
सिरतन ः तुहूँ नोनिये भुचेंग रहि गइला। बड़का लोग के अपने देह ले नानु होखे। एक आदमी के पीछे पचास गोजियैंला तौनो में ई त बबुई जी के बियाह के सरजाम नु हवे?
बुझावन ः एगो बरात के सरजाम त हमरैं गाँव से गइल हा, फेनु हमनी के मालिक के छप्पन गो मौजा बाटे, ई कुल्ह रखहू के जगह त ना होई।
सिरतन ः राखे के कौन बात लेले बाड़ऽ देखले नइखऽ, भंडार घर केतना बड़ बा? भंडारी के हाथ में चाभी के झब्बा नइखऽ देखले? फेनु सरकार संताखी साह के गोला खाली करा देले बाड़े।
नोहर ः हाँ जब गाँव भर के घर खाली करा दीहल जाय त छप्पन मौजा का छसैं मौजा के चीज बतुस राखल जा सकैले।
सिरतन ः बुझावन महतो! अबकी चला नु तुहीं, का केहु सवाँग के भेजवा मरदे। उहाँ दुसै ले त नोनियैं जुटिहें।
नोहर ः बाबू के घर बरात आई; औ ई दुसै नोनिया जुटि के का करिहै?
सिरतन ः फरुहा कुदार के बहुत काम रहैला नोहर। बबुआजी के बियाह भइल रहल त गइल ना रहलऽ ?
नोहर ः ना देवान जी! सुनी ले खाये बिना गति बनि जाले, एही से ना जाई।
सिरतन ः खाये के तकलीफ ना होले, हमरा त नइखे भइल।
बुझावन ः अपने के का होई, अपने के त बहनोइये बाड़े दरबार में. ....। बाकी देवान जी ! एक ओर से लूट लागल बा। आदमी बर-बेगारी में अपना कपारे चीज-बतुस आदि के दस कोश पहुँचावे जाला। मर-मजुरी त का मिली, अपना घर से सतुआ बान्हि के जाइले, इही ना होला कि हमनी के जुरतै छुट्टी मिल जाओ। चारि दिन चिट्ठियै पुरजा देवे में लगा देलें।
सिरतन ः एमें सरकार के कौनों दोस नइखे बुझावन महतो। दरबार में अइसहीं चलेला। एगो सरकार पाछें हजार गो आदिमी जीयेलें। बड़का के इहै नु ह?
नोहर ः आठ आना रुपया महीना जब तनख्वाह दिआई, त आदिमी का करी देवान जी। ई त मालिक के तु सोचे के चाहीं कि रुपया आठि आना महिन्ना में हरवाहीं-चरवाहों आजकल के दिन में ना मिली।
बुझावन ः तीन ढेबुआ सेर त मडुआ बा नोहर भाई। औ ढेबुआ सेर महुआ।
नोहर ः मुदा देवान जी। अपने महरौली के बाहर टोला के राजा बनि के बैठल बानी। छः हजार के तहसील में रुपया पीछे दु पैसा केतना होला?
बुझावन ः औ खाये-पीये में एको पैसा खरच ना होखे का? घर-भर के काम एहीं से चलैला?
सिरतन ः अब का अमदनी बा बुझावन महतो! हमरा बाबूजी के बखत देखतऽ, एही महरौली में सोना बरसत रहल हऽ।
नोहर ः महरौली में सोना अबहियों बरसता - देवान जी। बाकि हमनो खातिर ना, पाँच हजार के तहसील अब छः हजार हो गइल, दु-दु पुहुत के जोतल खेत मालिक निकासि के जिरात बना लेहलै, दुसै बिगहा जिरात कबही रहल हा देवान जी। ई हमनी का मुँहे जाब लगावल हऽ नु?
बुझावन ः आ सुनऽतानी मोटरवाला हर आवता जौनों गाँव के हरवाहा दु महिन्ना जीअत रहले हाँ, उन्हीं बन्न भइल, ओकनी के मुँह के अन्न छटल।
सिरतन ः बकास के झगड़ा जिला-जवार में ना उठत होइत, त ना नु निकलते? सरकार के एमें कौनों कसूर नइखे।
नोहर ः ए देवान जी! देखत-देखत आँख पाकि गइल। जान पड़ता कि महरौली में जेकर जनम-करम बा, जेकरा हजार पुहुत के हाड़ इहाँ गलि गइल, से किछुओ ना। आ दस कोस लमहरा ई अमहरा के बाबु साहेब महरौली के सब कुछ बाड़ें।
सिरतन ः नोहर राउत ! तोहार शिकायत कई बेर हमरा कचहरी में चहुँपलह, मोहित राउत के खियाल आवता, नाहीं त जानत नु बाड़ऽ जिमदारी फन्ना।
नोहर ः देवान जी! बाबू के खियात मति करो, जिनगी भर एगो भइंसि के उठौना बै पैसा क लगौले रहले, आ ओही से नु अपने के छोह बनल रहल हा।
सिरतन ः मालिक के जमीन में बसल बाड़ऽ, उनकरा निगाह में जीयत खात बाड़ऽ सेंतिहे ना नु दही दूध देलऽ?
नोहर ः ए देवान जी! बघउछ बाबा के चैरा अबरिन ले हमरा ईंहा हरसाले पुजाला। महरौली कुल्ह जंगल रहै। जब हमनी के पुरुखा अइले। हमार, बुझावन आ आउर लोग के पुरुखा जंगल काट के खेत बारी बनौले; बघउछ बाबा लेले कतना सवांग के बाघ मुअवलस, घर के केतना बच्चा के हुँडार उठा ले गइल।
बुझावन ः हुंडरहो त हाँ खानी हमरा दादा के होस तक होत रहल हा नोहर भाई।
नोहर ः आ खेत बनावे में केतना अदिमी साँप के कटला से मू गइले, तब महरौली गाँव बसल, तब महरौली में सोना बरिसे लागल, तब ओही सोना के लुटे खातिर अमहारा के बाबू चहुँपले। अमहारा के बाबू के एको बुन्न पसीनों नइखै चुअल महरौली में।
सिरतन ः विधि-बरम्हा के रेख पर मेख मारल तोहरा हाथ में नइखे नोहर! तोहार अमहरा के गढ़ में नइखे जनम भइल नाही त तुहूँ दू लाख के तसील पर बइठतऽ, मजिहाटर साहेब तोहरी के खुरसी दीतें। आपन हसियत देखऽ।
नोहर ः ए देवान जी ! ई हमरा कहला के जबाब ना भइल। हमनी के जनम महरौली में भइल बा। हम त इहे जानी ले कि मतारी के थने में दूध पहिले आवेला, तब लइका जनम लेला। हमनी के जनम जब महरौली में भइल बा, तबमहरौली हमनी के जीये-खाये खातिर हवे।
सिरतन ः जीअत-खात नइखऽ? महरौलिये का परताप से, बाबुए साहेब का परताप से नु? जौना पतरी में खाये के ओही में छेद ना करे के नोहर राउत!
नोहर ः बाबू साहेब के पतरी होई त अमहर में होई महरौली में ना देवान साहेब। महरौली ओही के हवे जेकर पुरुखा जंगल काटि के, बाघ हुडार मारि के एके अबाद कइले; महरौली में सोना बरसता-ओही हायन के परताप से, जौनन में दस-दस गो ठेला पड़ल बा।
सिरतन ः तोहरा अकिल से सोचें के होई, तब नु? मुदा अन्हरा के आगे रोवै आपन दीदा खोवै। गँवार के बुधियै केतना?
नोहर ः लुटै के बुधि न नइखे, खून चूसे के बुद्धि नइखे, बाकी माटी के सोना हइहे हथवा बनावेला देवान जी! छः हजार मालगुजारी द तीन हजार बबुनी के बियाह में दऽ दू हजार मोटर के चिट्ठा में दऽ, पाँच सै हाथी के चिट्ठा में दऽ, तीन सै घोड़ा के चिट्ठा में दऽ। सालभर बेगारी करत-करत मूअ। हेई मालिक के सवारी आइल, हेई मैनेजर साहब कै हुकुम आइल, हेई पटवारी, हेई सवार, हेई सिपाही-पियादा,हेई गोराइत बराहिल। दुत् तोरी के। कमाई हमनी के, ओ हरियरो ना होये पाई, जेही आवत सेही कुपुटी के खा लेता।
सिरतन ः घास जेतने कटाले-नोचाले ओतने फुनगी फेंकैले नोहर! तोहरा लोगन के एतना ना देवे के पडि़त; त इतना कमइबो ना करतऽ।
नोहर ः कमा-कमा के मुबहीं भर काम हमनी का ह। औ हमनी के कमाई में आगि लगावे वाला उहाँ अमहरा में केहू बैठल बा। बबुआ के बरात गइल रहल, त कै हजार अदिमी गइल रहले? पाँच हजार त अतिशबाजी में उड़ावल गइल। बनारस लखनऊ, आ कलकत्ता तक के दस गो नामी-नामी तवायफ गइल रहली, ई केकरा कमाई से देवान जी?
सिरतन ः अपना भाग से नोहर राउत! कमायेवाला कमाला, भाग वाला खाला। ”करम प्रधान विस्व करि राखा। जे जस करै से तस फल चाखा।“ बाबू साहेब ओह जनम में करम कइले बाड़े। ”तप चूकि राज“ भइल बा। तू ओह जनम के पापी हवऽ, उहे भोगत बाड़ऽ? केहूका हिरिस कइला से ना किछओ होला।
नोहर ः त हमनी जे ई घाम में खेती-कोड़त-जोतत मुइले, बरखा में दिन भर भींजीले। धान रोपीले, घास सोहीले, जाड़ा पाला में कठुआते खेत में सत्ती होईले। ई करम किछुओ नइखे?
बुझावन ः हमरा सोझवा अदिमी के बुधि में त इहे आवत आ कि भगवान जेकरा के जौना गाँव में जनम दिहलै, भगवान का ओर से ऊ गाँव ओकरे लिखा गइल; बाकी कागज पत्तर के बात, से भगवान का ओर से नइखै लिखा के आइल। महरौली के कचहरी से छपरा के कचहरी ले देखले नु बानी, कैसन कागज में इमानदारी राखल जाले।
नोहर ः बुझावन! जे घरनी माता के पाछे आपन खून-पसीना एक करेला, उहे इमानदारी के अन्न खाला। नाहीं त ई जिमदार बड़का जोंक हवे। बाप रे बाप! हमनी के देहि में इचको रकत ना रहि गइल, हाडौ-चाम एक जगह राखल मुसकिल बाटे, आ ओने गुलछर्रा उड़ता। 


(परदा गिरि जाता बा) 

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लेखक परिचय:- 

नाम: राहुल सांकृत्यायन 
जनम दिन: 8 अप्रैल 19893 
गोवास : 14 अप्रैल 1963 
जनम स्थान: ग्राम पंदहा, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत

36 भाखा के जानकार 
लगभग डेढ सौ किताब औरी हजारन गो लेख औरी आख्यान
साभार: श्री संतोष पटेल जी
अंक - 23 (14 अप्रैल 2015)

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