मंहगाई - जगदीश खेतान

महंगाई गरीब खाती हमेसा से सबसे बड़ दुसमन रहल बे। ओही के वरणन ए कबिता में बा। 
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का ईहे कहाई मंहगाई।
तनी बतलईब मंहगू भाई।।

दादा जब हमरे पढत रहें
खुद अपने मुंह से कहत रहें।
खडिया दवात मे घोर घोर
पटरी पर अक्षर गढत रहें।
अब उनके पोतन के देहीं
बा कोट पैंट और नेकटाई।।
का ईहे कहाई मंहगाई।
तनी बतलईब मंहगू भाई।।

जे के न जूरत रहल भगई
ऊ खाता रोज पान मगही।
जूता बाटा के पहिनत बा
जे घूमत रहल बिना पनही।।
अईलं जब पूत सऊदीया से
का खूब भईल हाई फाई।।
का ईहे कहाई मंहगाई ।
तनी बतलईब मंहगू भाई।।

जे सतुआ भूजा के तरसे
जे जोतत रहल खेत हर से।
कोईलरी गईल रहलं एक बेर
सौ रूपया करजा ले हमसे।।
ऊ ड्राइवर अब रखले बान
ट्रेक्टर से होता जोताई।।
का ईहे कहाई मंहगाई।
तनी बतलईब मंहगू भाई।।

नलका के पानी करछावे
अब मिनरल वाटर आवता।
मट्ठा महिया अब के पूछे।
पेप्सी कोला अब भावता।।
एक पसर दूध जे के न जूरे
ऊ काटे मक्खन मलाई ।।
का ईहे कहाई मंहगाई ।
तनी बतलईब मंहगू भाई ।।

जे चढल न कब्बो रेली मे
जेकर बिटिया पहिने गांती।
ए सी गाडी मे घूमेलं
इनके पोता उनके नाती।।
केहू घूमे जाता बम्मई
आ केहू जाता संघाई।।
का ईहे कहाई मंहगाई
तनी बतलईब मंहगू भाई।।

सुनले बानी हम बडकन से
अब अईसन गोली आवता
जेकरे खईले से गईल जवानी
फिर से धूम मचावता ।।
अपने ये गरीब देसवा मे
अरबन के बिक जाता डाई।।
का ईहे कहाई मंहगाई।
तनी बतलईब मंहगू भाई।।
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लेखक परिचय:


नाम: जगदीश खेतान 
निवास स्थान:- कप्तानगंज, कुशीनगर
शिक्षा: एम काम  प्रयाग विश्व विद्यालय 1962
कईगो कहानी के पुरस्कार मिलल बा
कईगो कहानी आकाशवाणी से प्रसारित
कईगो पत्रिकन में कहानी औरी उपन्यास धारावाहिक के रुप में परकासित

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