संपादकीय

अरुण शीतांश जी क दूगो कबिता

अरूण शीतांश जी के दू गो कबिता रऊआँ सभ खाती। पहिलकी कबिता गाँव-देहात में सहे वाला के दरद देखावत बा जेकर जिनगी करजा, भूखि औरी परेसानी में गुजरत बा। खेती बरबाद हो गईल बा औरी उ हार-थाक के झरिया जाए चाहता जेसे कि पेट जेवना के पापी कहल जाला भरि सके। आज के किसानन के इसे हाल बा ऊ ना चाहि भी देस दुआर छोड़े खाती मजबूर हो जाला। दूसरकी कबिता एगो गरीब के घर-दुआर छोड़ के परदेस में भईल दुरदसा देखावत बा। दुनू कबिता एक संगे पढ़ला पर लागी कि एगही कबिता पढ़ल जाता खाली परिस्थिति बदलि गईल बा।
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         -1-

जहिया के थरिया
उधारी भइल अब दुपहरिया,
ए करिया भाई !
हमहू जाईब ताबड़तोड़ झरिया।

रेहवा बिकात नईखे
भूखवा सहात नईखे
जाईबी संग सघंतिया।

मतिया कतनो हमार मराई
ऐ पराई माई
तू रहिह हमरे छांहीं
ऐ दुलारी माई॥

फ़सल बरबादे भईल
सगरो अन्हारे भईल
जाईब राजीव भाई के
कोठरिया
ऐ माई!
मिली लूंगी के नोकरिया ऐ माई!
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            -2-

रानी गावत बाड़ी गीत
उनकर लागल बा प्रीत

हम कोलकत्ता बानी
जंगल झाड़ खोजत फिरत
गावत
पकावत
लेके दूगो रुमाल
फेफेरी भईल बा बेहाल
तू
धीरे आव।

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लेखक परिचय:

नाम: अरुण शीतांश
जन्म:  ०२.११.'७२
शिक्षा:   एम ए ( भूगोल औरी हिन्दी में) एम लिब सांईस पी एच डी .एल एल बी 
प्रकाशन: दूगो कविता संग्रह, एगो आलोचना क किताब
संपादन: देशज नाँव क हिन्दी पत्रिका क संपादन, पंचदीप किताब क संपादन
कईगो भाखन में कबितन के अनुबाद
संप्रति:   नौकरी
संपर्क: मणि भवन, संकट मोचन नगर, आरा ८०२३०१

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