संपादकीय

अंक - 24 (21 अप्रैल 2015)

बीतल 14 अप्रैल के बाबा साहेब अंबेडकर के जनम दिन रहे। ई देस के भाग रहल बा कि अईसन बड़हन मनई कबो ए देस के माटी के सेवा कईले बा। लेकिन संङही ई देखि औरी पढि के बहुत बाऊर लागेला कि बाबा साहेब के एगो दलित नेता बना के जेहल में डाल दिहल गईल बा जबकी उँहा के एतना बड़ काम कईले बानी जेवना बराबरी करे लायक हजार साल में केवनो उदाहरन नईखे लऊकत। ए देस खाती औरी हिन्दू समाज दुनू खाती। बाकी राजनैतिक कारनन से उहाँ सोगहग उँचाई के छोट क दिहल गईल बा औरी ए काम में सबसे ढेर जोगदान अगर केहू के बा तऽ तथाकथित दलित चिन्तकन लोग के बा औरी तथाकथित सवर्ण चिन्तक लोग करईला के काम कईले बा लो। 
जब कबो बाबा साहेब के बात होला तऽ बात घूम-फिर के आरक्षण ले पहुँचि जाला। कुछ सवर्ण लोग बाबा साहेब के गलती बतावे के कोसिस करेला कि बाबा साहेब आरक्षण ले आ के देस के बहुत बड़हन नोकसान कऽ दिहलन। अईसन बात करे वाला लोग ए बात के भुला जाला कि आरक्षण के लाभ एही समाज के लोगन मिलत बा जेकर समाज में स्थिति केवनो बड़ाई लायक ना रहलि हऽ। केवनो समाज में केहू के लगे सभ कुछ रहे तऽ केहू के लगे कुछू ना; ई बहुत बढिया बात ना होखे ला। जहाँ सगरी समाज के बिचार करे के चाहीं कि काँहे अईसन हाल बा? कईसे ए भेदभाव के खतम कईल जा सकेला? लेकिन ई केहू ना कईल औरी अगर केहू कईल तऽ ओकर बात ओकरे सङगे खतम हो गईल। लेकिन बाबा साहेब ए काम के कईलें। रासता देखवलें कि कईसे समाज में खोंनाईल खंता भरल जा सकेला। काहाँ ले उहाँ के धन्यबाद कहे चाहीं पूरा देस औरी समाज के तऽ लोग बदला में सिकाईत कर ता औरी दोस देता। ई ऊ समय बा जब सभ केहू के मिल के बाबा साहेब के इमानदारी से समझे के चाहीं। 

आरक्षण जरूरी बा ए समाज के भेदभाव के कम करे खाती। जात के आधार पर आरक्षण मिले चाहीं लेकिन सङही इहो देखे होई कि कहीं केहू ए आरक्षण तरे पीसात तऽ नईखे। जेवन जात पिछड़ल बे, ओके आरक्षण मिलो लेकिन जेवन जात नईखे पिछड़ल ओके आरक्षण दे के कमजोर के औरी कमजोर कईल जाता। कांहे कि ओ जात के लोग कमजोर के नाँव पर मलाई खाता। ई बदले के चाहीं। सङही जे गरीब बा ओकरो के आरक्षण के लाभ मिले चाहीं, चाहें जात जेवन होखे। काँहे कि ई सरकारी भेद-भाव जेवन समाज के बढिया बनावे चाहत बा अगर आँख पर अंहवट बान्ह के चलत रही तऽ कुछ साल बाद कुछ जातन के दलित बना दी औरी एगो खंता भरे खाती दोसर खंता खोदि ली। औरी ई हाल केहुतरे ठीक ना रही। जरूरी बा अषाढ़ से पहिले बान्ह बान्हि लिहल जाओ। 



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कँवल से भँवरा विछुड़ल हो, 
जहँ कोइ न हमार ।।1।।

भौंजल नदिया भयावन हो, 
बिन जल कै धार ।।2।।

ना देखूँ नाव ना बेड़ा हो, 
कैसे उतरब पार ।।3।।
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भोजपुरी भाषा के दुर्दशा के जिम्मेदार तथाकथित स्वयंभू ठेकेदार लोग ही बा। ई बात ९ से १० साल पुरान हो गईल, जब हम पहिले बेरी भोजपुरी से जुडल कवनो मंच के साक्षी भईल रहीं। ई कार्यक्रम बनारस कऽ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगण रहे अउरी आयोजक लोग के दावा रहे कि उनका से बड़हन भोजपुरी के ठेकेदार लोग कोई नईखे। सहिये रहे। हमारा जइसन एगो दू गो कदम ना चले वाला सिपाही खातिर अइसन दावा गलत कइसे हो सकत रहे। बहराल गोष्ठी में जब एगो बुजुर्ग बोले शुरू कइले कि 'इहाँ हो हल्ला कइले कुछुओ ना होखी।


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  1. एगो तऽ बबुआ अपने गोर, उपर से लिहले कमरी ओढ़।
  2. एगो तऽ बबुआ सुकसुकाह, उपर से उठले अन्गुताह।
  3. हँसब ठठाएब, फुलाएब गालू। 
  4. चिरई के जान जाए, खवईया के सवादे ना।
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मोदी अईनी काशी
हई उहाँ कS भारत बासी।
भारत के मिली पहचान अब
काशी बनी भारत के शान अब।
काशी अब करे निहोरा 
भोजपुरी कऽ करऽ सम्मान पूरा।
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