विविध

कहाउत - भाग -1

दुनिया क हर समाज अपनी बिकास के जतरा में बहुत कुछ सीखेला औरी ऊ चाहे ला कि ऊ सीख औरी गियान अगिली पीढी ले पहुँचो औरी अगिला पीढी ओसे लाभ उठा सके। इहे ढंग बा केवनो सभ्यता औरी संस्कृति के बिकास के। भोजपुरिया समाजो समय के संङगे बहुत कुछ सीखलस औरी ओके एक पीढी से दूसरी पीढी ले पहुँचवल। ए काम खाती भोजपुरिया समाजो बाकी दोसर समाजन नियर अनगिनत कहाउतन के रचना कईलस। वाचिक परम्परा भईला से ए कहाउतन के अलगा-अलगा रुप में अलगा-अलगा जगह पर परियोग कईल जाला। लेकिन सभसे बरिआर बात ई बा कि चाहें रुप जेवन होखो, कहाउत क मतलब हमेसा एगो रहेला औरी परियोगो एकही नियर होला। रऊआं सभ के सोझा ए क्रम में अहाउत के पहिलका भाग परस्तुत करत बानी। ए बरिआर काम में श्री यशवन्त मिश्रा जी, उषा सिन्हा जी, समता सहाय जी, श्री मुकुन्द मणि मिश्रा जी औरी श्री जगदीश खेतान जी के बरिआर जोगदान बा। उहाँ सभ के बिना ई काम ना हो पाइत।
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  1. एगो तऽ बबुआ अपने गोर, उपर से लिहले कमरी ओढ़।
  2. एगो तऽ बबुआ सुकसुकाह, उपर से उठले अन्गुताह।
  3. हँसब ठठाएब, फुलाएब गालू। 
  4. चिरई के जान जाए, खवईया के सवादे ना।
  5. आन्हर गुरु बहिर चेला, माँगे गुड़ तऽ देवे ढेला। 
  6. जवन रोगिआ के भावे, तवन बैदा फुरुमावे।
  7. संग लागल लंगड़ो देवाल फाने ली।
  8. मुस मोटईहे लोढ़ा होइहे।
  9. जा के गोनसारी में भुजवा भुजावेली। चउरा के बालू मे पुरहर सिझावेली।
  10. गाछे कटहर ओठे तेल।
  11. जस गंधैली गड़ही, तस कनचोदी बकुली
  12. हँसुआ का बिआह में खुरपी के गीत
  13. बाप के नाम साग पात, बेटा के नाम परोरा।
  14. अबर बानी, दूबर बानी, भाई में बरोबर बानी। 
  15. बाढ़े पूत पिता के धरमे, खेती उपजे अपना करमे। 
  16. बईठल बनिया का करे? एह कोठी के धान ओह कोठी धरे। 
  17. मंगनी के चनन लगइब रघुनन
  18. बाहर लम्बी-लम्बी धोती, अन्दर खंडी-खंदी रोटी।
  19. दू बेकत के झगरा, बीच में बोले से लबरा। 
  20. गाय गुन बाछी, पिता गुन घोड़। नाही ढेर, तऽ थोरो-थोर॥
  21. घर फूटे जवार लूटे।
  22. बाभन, कुकुर नाऊ जात देख गुर्राउ
  23. तीन जात कुलघाती, ब्राह्मण,कुत्ता,हाथी।
  24. चउबे गईलन छब्बे बने दूबे बन के अईलन।
  25. बुरबक के ईयारी औरी भादो के उजियारी ले निमन बेकारी। 
  26. अरजु आन्हर बरजु कोढ, केकरा-केकरा के किनी घोड़।
  27. गोद में लईका नगर ढिंढोरा। 
  28. किस्मत खराब होखे त ऊंटों पर बइठल आदमी के कुत्ता काट लेवेला।
  29. चक डोले चकडमर डोले खैरा पीपर कबहूँ ना डोले।
  30. एक हाथ के ककरी नौ हाथ के बिया।
  31. भइस के आगु बीन बजावे भईंस रहे पगुराई।
  32. चलनी चलली सूपा के हॅसे जेकरा देही सतहत्तर गो छेद। 
  33. चले ना बने अँगनवे टेढ़। 
  34. गोदी में लईका शहर में डरेड़ा
  35. नाचे के ढंग ना, अँगनवे टेढ।
  36. गाछ ना विरिछ तहाँ रेंड परधान।
  37. पंडित जी,आन के दिन देखस, अपने चलस भदरा में।
  38. गोद मे छोरा सहर मे ढिंढोरा।
  39. फेड़ नाही रुख, उहाँ रेड़ परधान।
  40. बुझेली चिलम, जिनपर चढ़ेला अंगारी।
  41. छछुनर के मुड़ी चमेली के तेल।
  42. बानर के गरे रुद्राक्ष के माला।
  43. पानी में मछरी नौ-नौ कुटिया बखरा।
  44. करिया अछर भईंस बराबर।
  45. मरजी गोविन्द के, तऽ केराव फरे भेली।
  46. सुधा बाछी लुगा चबावे।
  47. अबरा के मउगी गाँव भर के भउजी।
  48. का पर करुँ सिंगार पिय मोर आन्हर।
  49. बिना मन के बियाह कनपटी सेनुर।
  50. दाई से ढीड़ छिपी।
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अंक - 24 (21 अप्रैल 2015)

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