संपादकीय

भोजपुरी के दुरदसा - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

भोजपुरी भाषा के दुर्दशा के जिम्मेदार तथाकथित स्वयंभू ठेकेदार लोग ही बा। ई बात ९ से १० साल पुरान हो गईल, जब हम पहिले बेरी भोजपुरी से जुडल कवनो मंच के साक्षी भईल रहीं। ई कार्यक्रम बनारस कऽ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगण रहे अउरी आयोजक लोग के दावा रहे कि उनका से बड़हन भोजपुरी के ठेकेदार लोग कोई नईखे। सहिये रहे। हमारा जइसन एगो दू गो कदम ना चले वाला सिपाही खातिर अइसन दावा गलत कइसे हो सकत रहे। बहराल गोष्ठी में जब एगो बुजुर्ग बोले शुरू कइले कि 'इहाँ हो हल्ला कइले कुछुओ ना होखी; आईं संकल्प लिहल जाव कि जबले भोजपुरी भाषा के ८ वीं अनुसूची दाखिल ना कइल जाई तबले हम भोजपुरिया लोग जंतर-मंतर पर अनसन कईल जाई आ बिना सफलता के ना उठल जाई।' बढ़िया बात रहे लेकिन आयोजक अध्यक्ष महोदय के शायद नीक ना लागल, तेजी से मंच पर गईले और बुजुर्ग महोदय के तनिका रोक के घोषणा कइले कि अबही उनका पास खबर आईल बा कि भोजपुरी के ८ वीं अनुसूची में दाखिल करे खातिर राष्ट्रपति महोदय के साइन हो गईल बा आ लोकसभा के अगिला सत्र में एह बात के कानूनी मान्यता मिल जाई। सारा हाल में ताली गूंजे लागल अउरी बुजुर्ग महाराज के आगे के भासन दिहला से ई कह के रोक दिहल गईल कि उनकर बात के अब कवनो मतलब ना रह गईल।
हम ना त अध्यक्ष महोदय के नाम बताईब ना ही मंच के लेकिन इतना जरूर कहेब कि एकरा बाद जवना भी सम्मलेन आ मंच के हिस्सा बने के मौका मिलल सब जगह कम बेसी मिला के एगुडे दही खाए के मिलल फिर चाहे बाबू साहेब के मंच होखे चाहे पंडितजी के आ चाहे लालाजी के। एह तरह के हर मंच पर सांस्कृतिक मनोरंजन के नाम पर फिल्मी नचनिया गवइया लोग खातिर खूब समय अउरी धन रहेला लेकिन संस्कृति आ संस्कार के धरोहर साहित्यकारन खातिर ना धन बा ना ही समय। भेड़ बकरियां नियर छोट से मंच पर बइठा दिहल जाला लेकिन ना त उनका के सुने खातिर समय बा ना ही धीरज; काँहे कि उनका खास निमत्रण पर आईल भीड़ के ई सब मंजूर नईखे। ओह लोग के साहित्यकारन से मतलब का? उ लोग त फिल्मी कलाकारन के देखे आईल बा लोग। भीड़ जेहर आयोजक ओहर। फिर खेल खत्म पइसा हज़म अगिला साल अइसने नौटंकी के देखावे के वादा के साथ।
नाम केहु के नईखे बाकि जानत बानी के बहुत बेजोड़-बेजोड़ लोग के बुरा लग सकेला पर सत्य ता कडुवे होखेला केहु माने चाहे ना माने। एह समय पर अपने लिखल एगो पंक्ति याद आ रहल बा-

चहलीं तऽ बहुत कि खुश रहीँ हम,
लेकिन दिल ही दगा दे गइल त का करीं ?
लगावे चलनी खूबसूरत बाग,
माली ही उजाड़ दिहलसि तऽ का करीं ?
वक्त के आँधी बड़ा बेदर्दी बा,
जब खुदा ही डूबा दे तऽ हम का करीं ?
दिल तऽ आखिर दिल ही बा,
जब टूट ही गइल तऽ हम का करीं ?

-------------अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"
अंक - 24 (21 अप्रैल 2015)

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