प्रकाश चाहीं? प्रकाश बा कहाँ? - रवीन्द्रनाथ टैगोर

प्रकाश चाही?
प्रकाश बा कहाँ?
दीया लेसे के होखे
त विरहानल से लेस लऽ
बुताइल दीया राख के का होई?
इहे लिखल रलऽ भाग में?
एह से त मरन अच्छा!!
आरे, जरा ल विरहानल
विरह का आगी से नया जोत जागी
बुताइल दीया बरे लागी।
वेदना दूती गा रहल बिया-
”आरे रे प्राण
तोरा खातिर जागे भगवान।
रात के घनघोर अन्हरिया में
अभिसार खातिर
भगवान कबसे तोरा के पुकारतारे।
तोर बेचैनी देख के
तोरा प्रेम के मान देतारे।
तोरा खातिर भगवान जागतारे।।“
आकाश के आंगन मेघ से भर गईल
बरखा के पानी झरझर झरे लागल
एह घनघोर रात में हमार प्राण
केकरा खातिर अकुलाए लागल?
मेघ के पानी झर-झर झरे लगल।
बिजुरी के चमकी
छनभर खातिर आवता
ऊ त घनघोर अन्हरिया के
अउरो गहिरावता।
बाकिर ना जानी जे केने से
कतना दूर से
कवनो गीत के गंभीर स्वर
रसे रसे आवता।
वंशिया बजावता।
हमरा पूरा प्राण के
अपने ओरी टानता।
प्रकाश कहाँ?
प्रकाश कहाँ बा?
दीया लेसे के होखे
त विरहानले से लेस ल।
मेघ गरज रहल बा
हवा हहकार रहल बा
बेड़ा बहक जाई
त गइल मुसकिल हो जाई
करिया कुचकुच
घनघोर अन्हरिया रात में
प्रेम के दीया के
विरहानल से बार के
अपना प्राण के
प्रकाशित कर लऽ
विरह के आग से
प्रेम के दीया जरा लऽ।
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