व्यवहार - विद्या शंकर विद्यार्थी

"चाची, जब हम बिस्कुटओ किनऽ के खात रहीं तऽ तूँ छकुनी ले के धा गइलु कि पइसा चोरा के खाता, अब दिसो करे आइल बानी तऽ ऊपर से छकुनी देखावतऽ बाड़ु।"

"बिस्कुटवा तऽ अब पइसा नू बनके ना नू निकली आकि तोहरा मारे से पइसा बन जाई आ हम पइसा दिसा फिर देब बोलऽ चाची।"

"चाची, हमार माई रहीत तऽ सोनो जइसन पदारथ दोकनदरवा के देके खा जइतीं हम तऽ ऊ ना नू मारित। ना नू आँख देखाइत।"

"हमरा से हमार माई के भगवान इहे मार खिआवे खातीर छिन लिहलन। चाची तूँ अपना बबुआ के काहे ना मारेलु आन के लइका के दूगो बिस्कुट किन के खइला खातीर मारल जाला चाची।"

बिरजू सुसुक सुसुक के आँख के लोर पोछे लागल।

"तूँ अपना बबुआ के काहे ना मारेलु" जइसन बोली गूंजे लागल।

पितिआइन के हृदय तबो ना पसिजल कि बिरजू बड़की दीदी के ना बलुक समय के सँउपल थाती हउए। हम ई का करऽतानी।
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व्यवहार - विद्या शंकर विद्यार्थी, भोजपुरी लघुकथा, Bhojpuri Kahani,लेखक परिचयः
नाम: विद्या शंकर विद्यार्थी
C/o डॉ नंद किशोर तिवारी
निराला साहित्य मंदिर बिजली शहीद
सासाराम जिला रोहतास (सासाराम )
बिहार - 221115
मो. न.: 7488674912

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