अचेत - विद्या शंकर विद्यार्थी

माई आ बाबूजी के लमहर जिनगी के लमहर अनुभूति रहे। अशोक जब घर से नौकरी करे खातिर पहिला दिन चलल रहन त दुनों परानी बहुत समुझवलस कि बबुआ नौकरी में सब कुछ रोपेये आ पइसा ना होला। घर में जइसे दू भाई में दूध के धोअल बने के परेला तब कहीं शांति कायम रहेला। तसहीं बहरो में अमन चैन से रहे खातीर भाई दाखिल मिलल साथी से भी मिल जुल के रहे के परेला। एह लेखा बेवहार बनवला से कहीं कवनो तकलीफ ना होखे। एकर परभाव दूरगामी होला बबुआ। आ फल मधुर भेंटेला। बेईमानी से दूगो आइल पइसा में कांट हो जाला। तत्काल कांट ना खटकल गड़ल त का आगे दिन चल के गड़ेला। बाकी ना रहे। 

अशोक कुछ दिन माई आ बाबूजी के कहल राह पर रहलन बाकि जब लोभ लालच के दुनिया के हवा लागल त सब बात तित लागे लागल। फेर का रहे जवन आवे तवने में हाथ रंगे लगलन आ एक साथ काम करे ओला संघतियो के हक दबा घालस। संघतिया के हवा लागे आ पूछे त आँख देखा देस। संघतिया उनुकर बदलल नीयत से से घृना करे लागल आ दुखी हो गइल । आ मान लेलस कि हमार त अधे दबइलन आधा त उनुके रहे । जास सुख से उहे रहस। अशोक ओह पइसा से दू तल्ला पक्का बिल्डिंग बना लेलन। संघतिया के त मटिये के घर उनुका पक्का के बिरावत रहे। जइसे अशोक संघतिया के उपहास करस तइसे उहो करे। 

समय एक दिन अइसन बदलल कि अशोक के लकवा के हवा लाग गइल । सब पइसा उनुका में झोंका गइल हालत तबो ना सुधरल। एगो बेटा रहे तवनो आपन राह बदल देलस। मेहरारू से जतना बने दास भाव से पेश आवे। आ कहीं चल जाए त केहू माछिओ हांके ओला ना रहे, भिरी। लकवा के मारल मुँह बवाइल रहे। लार गिरे। जब मन तब मुँह में माछी आवन सन आ जा सन। जइसे बुझाए उनुका संघतिया के मारल पइसा के रूप में आज अशोक ना माछी जशन मनावताड़ी सन। आ आज घरवो उपहास करऽता। 

कर्म ग्रंथ कहेला आदमी के ना रहे के चाहीं अचेत, ना मारे के चाहीं केहू के हक। आन के दबइला पर, रोआँ दुखइला पर माछी का कुकुरो मुँह चाटेलसन आ पेशाब पान करावेलसन। केहू काहे बा अचेत।
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लेखक परिचयः
नाम: विद्या शंकर विद्यार्थी
C/o डॉ नंद किशोर तिवारी
निराला साहित्य मंदिर बिजली शहीद
सासाराम जिला रोहतास (सासाराम )
बिहार - 221115
मो. न.: 7488674912

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