कथा कस्बा - दिनेश पाण्डेय

जहवाँ तक नजर धावे
झिलमिल पानी परिखा,
भीतरी गझिन हरियर जंगल दबा के
निकसल टेढ़मेढ़ पथल के भव्य कोट,
ऊपर ढीह से मध ढलान तक,
नीचे के चउरस मैदान तक,
जीवंत मनसायन।

आँखि मुकुले से मुलुके आ मूने के बीच के
डरपोक बाकिर सुघर जिनिगी के एह सङ्ह सरूप के
का कहल जाव?
गाँव, कस्बा, नगर, कि देश, कि देह?
हिंहवें बिलम गइन्हँ बस चार दिन बदे।
मौसम भरुआह रहल ह
थकल देह आ मनो गरुआह रहल ह।
ढेर त हिंहाँ के सुखमा रहल ह
थोरे मन के चाह रहल ह।
हिंहवें बिलम गइन्हँ बस चार दिन बदे।
कुछ बेबसी रहल ह, कुछ उछाह रहल ह,
हम बिलम गइन्हँ त बिलम गइन्हँ,
रमता जोगी बहता पानी।
खूबे घुमिन फिरिन आ देखिन-
करियट्ठी रतिया से जनमत भोर रहे,
चुप्पी में से कढ़ि आइल बड़मनी शोर रहे,
साधू नियन चोर रहे,
सलग रहे, थोर रहे,
हाट अ बाजार रहे,
कतिने बैपार रहे,
पाना कुछो, खोना कुछो
तनीमनी सुख अउरी दुख बेसुमार रहे।
जतिने बटोरऽ तले भर भरकि जाला
छबनी-खदोनों में से
खर से खरकि जाला।
कसबिनियाँ रे! मरलू करेजवा में बान।
मोर जनियाँ रे! छछनत रहले परान।

एक दिना गफलत में रहे सारी नगरी।
कवन भीतरघतिया उछाल गइल पगरी।
मनगवें खोल गइल बजर केवाँरी,
हहरात ढूकि अइलन अनगिन तातारी।

कस्बा भ गइल छत-बिछत।
चिराइँध धूँआ ऊपर उठल आ पसर गइल जंगल का ऊपर।

चारि ओरी लउकऽता अन्हरिया हो राम!
डूबि रहल सगरी नगरिया हो राम!
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लेखक परिचयः
नाम: दिनेश पाण्डेय,
आवास संख्या - 100 /400,
रोड नं 2, राजवंशीनगर, पटना - 800023.
मो. न.: 7903923686

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