संपादकीय

सन्त पलटूदास जी कऽ दू गो निरगुन

भोजपुरी कऽ बहुत पुरान कबि सन्त पलटूदास जी कऽ दू गो निरगुन 'प्रेम बान जोगी मारल हो' औरी 'मितऊ देहला ना जगाया' रऊआँ सभ खाती। इहाँ सन्त कबीर के परम्परा के सन्त रहल बानी औरी ओही ढँग से आपन मन रखले बानी। दुनू छंदन में निरगुन ब्रह्म से आपन परेम देखवले बानी बस ढंग अलग-अलग बा। रऊओं पढिं।
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प्रेम बान जोगी मारल हो

प्रेम बान जोगी मारल हो कसकै हिया मोर।।
जोगिया कै लालि-लालि अँखियाँ हो, जस कॅवल कै फूल
हमरी सुरुख चुनरिया हो, दूनौं भये तूल।।
जोगिया कै लेउ मिर्गछलवा हो, आपन पट चीर
दुनौं कै सियब गुदरिया हो, होइ जाबै फकीर।।
गगना में सिंगिया बजाइन्हि हो, ताकिन्हि मोरी ओर
चितवन में मन हरि लिन्हि हो, जोगिया बड़ चोर।।
गंग जमुन के बिचवाँ हो, बहै झिरहिर नीर
तेहिं ठैयां जोरल सनेहिया हो, हरि लै गयौ पीर।।
जोगिया अमर मरै नहिं हो, पुजवल मोरी आस
करम लिखा बर पावल हो, गावै पलटू दास।। 
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मितऊ देहला ना जगाया

मितऊ देहला ना जगाया; नींदिया बैरिन भैली।।
की तो जागै रोगी, की चाकर, की चोर
की तो जागै संत बिरहिया, भजन गुरु कै होये।।
स्वारथ लाय सभै मिलि जागैं, बिन स्वारथ ना कोय
पर स्वारथ को वह ना जागै, किरपा गुरु की होय।।
जागे से परलोक बनतु है, सोये बड़ दुख होय
ज्ञान सरग लिये पलटू जागै, होनी होय सो होय।। 
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लेखक परिचय:-

जनम स्थान: जलालपुर, फैजाबाद उत्तर प्रदेश

अंक - 33 (23 जून 2015)
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