संपादकीय

अंक - 19 (17 मार्च 2015)

मैना कऽ उनईसवाँ अंक आज रऊआँ खाती पेस करत बानी। ए अंक में पाँच गो रचना बाड़ी जेवना में से कुछ दू गो काब्य तऽ तीन गो गद्रय चना बाड़ी सऽ। एगो ललित निबन्ध होरी पर तऽ दूगो संस्मरण परस्तुत बा ए अंक में। 

- प्रभुनाथ उपाध्याय
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परिचय दास जी के लिखल परस्तुत ललित निबंध "होरी: मन के ॠतु कऽ बसंत" बसंत औरी होली के पछा औरी फइलाव देखावत बा। ए ललित निबन्ध के सहारे होरी औरी बसंत के जिनगी, मन औरी संस्कृति से होखे वाला बतकही जेवन लऊके ला ना औरी अनचिन्ह बा लेकिन असर जिनगी में देखाई देला।
होरी मन कऽ संवाद हऽ। एकहरा ना बहुआयामी। रंग कऽ संवाद, हृदय कऽ संवाद, ॠतुअन कऽ संवाद…………। 
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आज से चार साल पहले फलेरिया के चलते हमरा हर दसवां दिन बुखार हो जाये। एक दो दिन बुखार रहे एक दो टाबलेट खाली ठीक हो जाये लेकिन हरहाल में बिना नागा दसवाँ दिने बुखार का आवही के रहे। गांव के डाक्टर से लेके छपरा पटना तक इलाज करा लेनी लेकिन दसवां दिन बुखार आइये जाये। भाईजी ई एकदम सांच घटना ह हमरा प बीतल। ईहांतक कि हमार लड़का लोग दिल्ली मुम्बई रहेला भाई कोलकता रहेलन उहां भी इलाज हो गैल लेकिन बुखार दस दिन से इगारे दिन ना होखे देवे।
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लरिकाई में हमनी के जाने केतने खेला खेले बानी जा जेवन हमनी के मन के भीतर एगो कोना में कहीं चुपचाप लुकाइल बाड़े सऽ लेकिन जइसही ओकर इआद आवेला तऽ दुनिया एकदम दोसर लागे लागेला। कुछ ओइसने इआद परस्तुत बा जेवन रउआँ ओ जुग में ले जाई जेवन ना कबो पुरान होला नाही ओराला। भलुक ओकर हिस बढत जाला उमिर बढ़ला के संगे। 
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माई की अँचरा के छाँव हS, 
सबसे नीमन हमार गाँव हS, 
जहाँ गाइ, बछड़ू के दूध पियावे, 
प्रेम से ओके चूमे-चाटे, 
पुरनियन की सनेह के छाँव हS, 
सबसे नीमन हमार गाँव ह. 
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हम त तोहसे प्यार करिके सब कुछ पयिनी 
जिए के लुर आ गइल हम आवारा भइनी 
हम त तोहसे .......................... 
तोहरा बिनु प्यार अउरी प्यार बिनु जिनगी बेकार बा 
घर कर जाला उ दिल में 
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