संपादकीय

अंधविश्वास (संस्मरण)- मृत्युंजय अश्रुज

जागs और जगाव
अंधविश्वास के भगाव 
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आज से चार साल पहले फलेरिया के चलते हमरा हर दसवां दिन बुखार हो जाये। एक दो दिन बुखार रहे एक दो टाबलेट खाली ठीक हो जाये लेकिन हरहाल में बिना नागा दसवाँ दिने बुखार का आवही के रहे। गांव के डाक्टर से लेके छपरा पटना तक इलाज करा लेनी लेकिन दसवां दिन बुखार आइये जाये। भाईजी ई एकदम सांच घटना ह हमरा प बीतल। ईहांतक कि हमार लड़का लोग दिल्ली मुम्बई रहेला भाई कोलकता रहेलन उहां भी इलाज हो गैल लेकिन बुखार दस दिन से इगारे दिन ना होखे देवे।
हमार एगो हरवाह कहीं बटाइदार कही दुसाध जाति के बा। ऊ भगत कहाला ।देवल पर सावन मे पूजा चढ़ावेला। लोग के जंतर मंतर कर ताबीज गंडा भी देवेला। हमरा मलकिनी से कहलेस -
"चाची चाचा का कुछ ऊपर वार के फेर हो गैल बा। हम एगो जंतर बना देब। पेन्हली हें चाचा त बोखार का कवनो रोग पास ना फटकी। दु कोस दूरे रही।"
हम त ई सब ना मानी। हम मलकिनी के मना करनी ई सब फेर में मत पड़s। ये सब से रोग छुटी? लेकिन औरत लोगके जानते बानी का जाने केतना रपया ओकरा के दे जंतर बनवा हमरा के त जबरदस्ती पेन्हा देली। जहिया पेन्हनी अबकी एकदिन पहिलही बोखार आ गैल आ हरबार एक से दु दिन में चल जात रहे अबकी जंतर पेन्हला पर चारदिन रह गैल। कहनी भगतवा से त मुंह बनाके रह गैल। आ हम ओही घड़ी जंतर खोलके फेंकनी। मलकिनी के भी कहनी ई सब के चक्कर छोड़s।बाद मे दवा से ही ठीक भैनी आ आज चार साल में फेर बोखार घूमके अभी ना आइल हs।
त भाई लोग जे जहां बा प्रयास करो कि लोग अंधविश्वास के भंवर से निकलो। ई सब अंधविश्वास हमनी के पिछड़ापन के निशानी आ कारण बा। ई अंधविश्वास अज्ञानता या शिक्षा का कमी से बा ई बात सही बा लेकिन शतप्रतिशत ना काहे कि बहुत पढ़ल लिखल लोग के भी येह फेर में पड़के गंवावत आ बरबाद होत हम देखले बानी। जरूरत बा ई ढोर कमंडल से लोग के मोह छोड़ावल। ठगवन के ठगी के पर्दाफाश कैल।

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