संपादकीय

चिउंटा हो चिंउटा, मामा के झगड़वा छोड़हिय हो चिऊंटा

लरिकाई में हमनी के जाने केतने खेला खेले बानी जा जेवन हमनी के मन के भीतर एगो कोना में कहीं चुपचाप लुकाइल बाड़े सऽ लेकिन जइसही ओकर इआद आवेला तऽ दुनिया एकदम दोसर लागे लागेला। कुछ ओइसने इआद परस्तुत बा जेवन रउआँ ओ जुग में ले जाई जेवन ना कबो पुरान होला नाही ओराला। भलुक ओकर हिस बढत जाला उमिर बढ़ला के संगे।
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"चिउंटा हो चिंउटा, मामा के झगड़वा छोड़हिय हो चिऊंटा।" 
एकरा बाद लत्ता-लुत्ती होखे आ तब सब लईका गंगा नहाये जाई। गंगा नहान कके जब लईका आ जइहे सन तब पूछाई कि नहान कके का ले आईल बाड़ अ। उ तरह-तरह के खायक के नाम ली। तब चंदा मामा के खीयावल जाई। घर भर के नाम लेके खियावल जाई। तब अपने खा के खेल खतम होई। पुरनका ग्रामीण खेल में -छोट जीव-जन्तु,नदी,परिवार सबका के समेट के बड़ा सुंदर भाव बा ये खेल के।
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लेखक परिचय:-

एम.ए.पी-एच.डी-"भोजपुरी साहित्य में गीति काव्य "
सेवा निवृत शिक्षिका, वी एम इंटर कालेज, गोपालगंज
निवास:- मालवीय नगर,गोपालगंज,बिहार।
प्रकाशित उपन्यास:- धरनी में धंसौ कि आकाशहि चिरौ

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