संपादकीय

अंक - 12 (27 जनवरी 2015)

आज रऊआँ सभ के सोझा मैना के बारहवाँ अंक परस्तुत बा। ।एह अंक में तीन काब्य रचना औरी एगो कहानी बाड़ी सऽ।
- प्रभुनाथ उपाध्याय

---------------------------------------------------------------------------------------------------
एतवार के दिन, ऑफिस बंद रहे, हम बंदी के भरपूर आनंद उठावल चाहत रही। हम आपन पत्नी गीता के साथे सान्झिखे छत प लागल झुला प बैइठ के आलू के चिप्स आ चाय के आनंद लेत रही। तबही बगल में बईठल हमार प्रिये पत्नी गीता आसमान के निहारत एकदम से शांत हो गईल रही। आ हम आपन आफिस के बात लेके बकबक कईले जात रही। लेकिन हमार बात सुनेवाला जे कहा कोई रहे। जे भी रहे ऊ तऽ सुन कही आकाश में भुला गईल रहे। 
----------------------------------------------------------------------------------------------
जीअन कहले गाँव में 
पिपरा के छाँव में 
इनरा के पानी पर 
लौकी-कोहड़ा छान्ही पर 
जे के मन करे 
तुर के खाव, 
धोबीघटवा में डुबकी लगाव। 
------------------------------------------------------------------------------------------------------

दूध के धोवल केहू नईखे, सबके मगज में खोट बा।
जुबान के इज्जत केहू करे ना, सबके नजर में नोट बा॥

नोट के खातिर आपन अनकर, लोग भुलाईल कान्ह।
तन के माटी सभे सँवारे, तू प्रेम के गाँठरी के बान्ह॥

बिष कुंभ में क्षीर भरल बा, नीर आँख से टपकत बा।
अनकर सेनुर राह चलत में, लोगवा काहें लपकत बा॥
-----------------------------------------------------------------------------------------------------

चलत-चलत मोरा पईया पिरइले, ए ननदिया मोरी रे

तबहूं ना मिलेला उदेश, ए ननदिया मोरी रे।

अपने न अइलें पिया भेजलें ना सनेसवा, ए ननदिया मोरी रे।
भेज देले डोलिया कहार, ए ननदिया मोरी रे।
--------------------------------------------------------------------------------

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.