कहीं का, करीं का, चली कौन राहे - सूर्यदेव पाठक 'पराग'
कहीं का, करीं का, चली कौन राहे अजीबे दशा बा भइल आदमी के। पराया के आशा कइल छोड़, खुद पर उचित बा भरोसा कइल आदमी के। जरल जे बना के स्वयं प्राण-...
कहीं का, करीं का, चली कौन राहे अजीबे दशा बा भइल आदमी के। पराया के आशा कइल छोड़, खुद पर उचित बा भरोसा कइल आदमी के। जरल जे बना के स्वयं प्राण-...
जवानी जोश के आगार होला लबालब प्रेम-पारावार होला। डगर में पाँव थम-थम के उठाईं अनेसा बहके के हर बार होला। धरेला ठीक से पतवार सेही मजे में पार ...
आँतर के बात खुलि के बतावेला चेहरा मत पूछीं, का बवाल मचावेला चेहरा आँखिन से झर के लोर समुन्दर बन भले हुलसत हिया रहेला त गावेला चेहरा अइसन ना ...
तरकुल के छाँव में नफरत के गाँव में कतना पैमाल भइल जिन्दगी! पीरा अँगेज के सपना सहेज के बंधक पड़ल बाटे धड़कन करेज के दर्द पोर-पोर ले अँखियन मे...
भोजपुरी साहित्य आ ओसे जुड़ल साहित्यकार लोग पर विचार करे पर अजीबोगरीब स्थिति से गुजरे के पड़ेला। अनेक साहित्यकार त कवनो एक विधा में लगातार सा...