तरकुल के छाँव में - सूर्यदेव पाठक'पराग'

तरकुल के छाँव में
नफरत के गाँव में
कतना पैमाल भइल जिन्दगी!

पीरा अँगेज के
सपना सहेज के
बंधक पड़ल बाटे धड़कन करेज के
दर्द पोर-पोर ले
अँखियन में लोर ले
जिउआ के काल भइल जिन्दगी!

अपनापन छूट रहल
दिल दरपन टूट रहल
स्वारथ बटमार सभका सोझा बा लूट रहल
अदिमी बा दाँव पर
कागज के नाव पर
सतरंजी चाल भइल जिन्दगी!

समय ई सँपेरा बा
लगा रहल फेरा बा
चंदन के डारी पर विषधर के डेरा बा
भूख कहीं लहकत बा
लोग-बाग डँहकत बा
फाटल रूमाल भइल जिन्दगी!
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सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

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