आई गइले जेठ के महिनवाँ ए, भइया,
लुहिया तऽ अब चलेले झकमोर॥
तपत बांटैं सुरज, नाचति बाय दुपहरिया
अगिया डड़ावै चलि-चलि पछुआ-बयरिया
उसरन में बाढ़े अब बबंडल घुमरावत देखि के
दुपहरिया पंछी नाउनि बाटी गावत॥
सूखि गइली ताल-तलई नदिया सिकुड़ली
हरियर उसरौही घास दरियै भुकुड़ली।
पेड़वन के छाँह चउवा करेले पगुरिया
गावै चरवहवा फेरि-फेरि अपनी मडरिया॥
अहसने समय में खरबुज्जा हरिअइले
अउरी हरा भइल बाय बोरो धान।
हमरे दुसमन बनके मन हरिअइले
हमरा सूखि गइले हे गरब-गियान॥
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लेखक परिचय:-
नाम: ठाकुर विश्राम सिंह

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