जेठ के महिनवाँ - ठाकुर विश्राम सिंह
आई गइले जेठ के महिनवाँ ए, भइया, लुहिया तऽ अब चलेले झकमोर॥ तपत बांटैं सुरज, नाचति बाय दुपहरिया अगिया डड़ावै चलि-चलि पछुआ-बयरिया उसरन में बाढ़...
आई गइले जेठ के महिनवाँ ए, भइया, लुहिया तऽ अब चलेले झकमोर॥ तपत बांटैं सुरज, नाचति बाय दुपहरिया अगिया डड़ावै चलि-चलि पछुआ-बयरिया उसरन में बाढ़...
नदिया किनार एक ठे चिता घुंघुआले, लुतिया उड़ि-उड़ि गगनवा में जाय। लहकि-लहकि चिता लकड़ी जलावै, धधकि-धधकि नदी के सनवा दिखाये। आइ के बतास अगियन ...
अइले बसन्त महँकी फइललि बाय दिगन्त, भइया धीरे-धीरे बहेली बयारि। फूलैलें गुलाब, फुलै उजरी बेइलिया, अमवाँ के डरियन पर बोलैली कोइलिया। बोलैले पप...