नदिया किनार एक ठे चिता घुंघुआले,
लुतिया उड़ि-उड़ि गगनवा में जाय।
लहकि-लहकि चिता लकड़ी जलावै,
धधकि-धधकि नदी के सनवा दिखाये।
आइ के बतास अगियन के लहरावै
नदिया के पानी आपने देहिया हिलावै।
चटकि-चटकि के चिता में जरत बा सरिरिया
नाहीं जानी पुरुष जरे या कि जरे तिरिया।
चितवा त बइठल एक मनई दुखारी
अपने अरमनवन के डारत बाटें जारी।
कहे 'बिसराम' लखिके चितवन के काम
मोर सनवा ई हो जाता बेकाम।
अइसने चिता हो एक दिन हमई जरवलीं
वही सग फूँकि दिहली आपन अरमान।
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लेखक परिचय:-
नाम: ठाकुर विश्राम सिंह

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