नयकवा - बाबा भिखारी गोस्वामी

सूतल रहती हम सैंया सुख-सेजिया से,
सपना देखलि अजगुत रे नयकवा ।

जब-जब मन परे नैना से नीर ढरे,
धर-थर कॉंपेला करेज रे नयकवा।

बेटी अनबोलता के मँगिया जराई कोई,
बालू ऐसन मुहर गिनाते हे नयकवा ।

मूँहवाँ में दाँत नाहीं, बरवा पकल बाटे,
बुढ़उ के मउरि पेन्हावे रे नयकवा।

महल में बेटी रोवे, बेटा घोड़सारी रोवे,
बाप मूँह करिखा लगावे रे नयकवा।

बेटी से कमाइ धन, पंच के खिलावे ऊहे,
गुप्त पाप दुनिया सतावे रे नयकवा।

पंच पर गाढ़ परल, बुढ़वा तरसि मरल,
नहके में इज्जत गँवावे रे नयकवा।

चारों ओर देख के चण्डाल के चौकड़ि तऽ,
मोरा पेट पनियाँ ना पचे रे नयकवा।

ऐसन कुरीति के विवेक से सुधार ना तऽ,
भरल सभा में जात जाई रे नयकवा।
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लेखक परिचय:-
नाम: बाबा भिखारी गोस्वामी

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