रामनवमी के दिन रहे। शिव-लगन बो अहिरिन के, देवास लागल रहे। ऊ नहाइ धोयाइ के, नया लूगा झुला पहिर के, मूडी गडले बइठल रहली। माता मइया के, आवही के इंतजार रहे। कुछ देर के बाद ऊ लमहर, साँस खींचे आ छोड़े लगली। फेर फुफुकारे लगली, आ खाढ़ होके दूमे लगली। मइया के सवारी, उनुका पऽ कसा गइल रहे। ऊ दुनों हाथ में, नीम के छिउँकी लेके, देंहि झोरे लगली, आ दूमि-दूमि खेले लगली। देवास में आइल लोग, समुझ गइल रहे कि अब ई शिव-लगन बो, अहिरिन नइखी रहि गइल। ई छछात मइया हो गइल बाडी। एगो छवना के गर्दन कटाइल। छीपा में ओकर खुन ओड़ाइल। माता मइया, हँकासल-पीआसल, छीपा के खून पऽ झपटली, आ एके साँस में, एक सुरुकिये, घटर-घटर मय खून पी घलली। मइया के आँखि, लाल टेस हो गइल। ‘त्राहि मझ्या! त्राहि मइया!’ के सोर से, आकाश गूँज उठल।
देवास में तील घरे के जगह ना रहे। ठसाठस बूढ सेयान, लइका जवान औरत-मरद से खमाखम भइल रहे। धूप के हवन के, सुगंधित अगरबती के धुआँ से, वातावरण गमगम गमकल रहे। ढेर अरजिहा जूटल रहले। एक-एक कइ के, लोग खाढ होत रहे। आपन-आपन गरज कहत रहे। माता मइया सुनत रही। कुछ पूछत रही। उनुकर आसिरबाद लेके, लोग बइठल जात रहे।
ओही जमात में से, एगो जवान मोची, हाथ जोरले ठाढ़ भइल। माता मइया के नजर, ओकरा पर परल। माता मइया, ऊँच आवाज में पूछि बइठली, 'ते कइसे आइल बाडे रे?" मोची के ओठ कहे खातिर खुलल, तले माता मइया, ओकरा पर बरिस पडली - "ते! हमरा भतार के जूता बनवलिस? कतना दिन कहला भइल ?? लगे पैर उनका घूमत, कतना दिन बीतल?" मोची रिसिया के बोलल, “हे माता मइया! हम ना जानत रहली हां कि माता मइया के भतारो होला?”
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पिता: स्व० कविवर पं० ब्रहोश्वर ओझा
जन्म तिथि: 21 मई 1932 ई०
अलंकरण: साहित्य शिरोमणि भारत सेवाश्रम संघ, जमशेदपुर, डॉ० जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन सम्मान - अखिल भारतीय भोजपुरी भाषा सम्मेलन, पटना (1991), भोजपुरी

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