रूपिया के गाछ - राम प्रकाश तिवारी

रामसेवक आ सीताराम एके ऑफिस में काम करत रहे लो। दूनू जाने लइकाईं के संघतिया रहे लोग आ सब तरे बराबर रहे लो। एक दिने सीताराम कहले

“भाई रामसेवक, सुनऽ अब हमनी के लइका सेयान होतारे सं। एकनी खातिर कुछ जोड़ बिटोर करे के चाहीं। तु का कहतारऽ बतावऽ”

सीताराम के ई बात सुन के रामसेवक कहले “हो भाई, बात त तुं नीमन कहतारऽ, हमनी के कुछ करे के चाहीं। अब तुं बताव का करे के तहार विचार बा?”

एह बात पर सीताराम कहले “सुनऽ हम कहेब कि हमनी के अपना अपना लइका के नांवे दस पंद्रह एकड़ जमीन कीन लेबे के। कहऽ कइसन रही?”

तब रामसेवक कहले “भाई बात त ठीक बा बाकिर हम मानिले 'पूत कपूत त का धन संचय, आ पूत सपूत त का धन संचय'। भाई हम त कहेब कि हमनी अपना लइकन के पढ़ा लिखा के जोग्य बनावल जाओ त धन त ऊ अपने कमा लिहन।”

सीताराम के रामसेवक के मुंह से अइसन जवाब के आस ना रहे, उनकरा रामसेवक के ई बात पसन ना परल आ ऊ तनी रोसाह बोली में रामसेवक से कहलें

“सुनऽ भाई, आज ले हमनी के कवनो हारा-बाजी नइखे भइल। बाकी आज हम तहरा के कहतानी कि आज से एगो हारा-बाजी लागे कि 'के अपना लइका खातिर रुपिया के कतहक गाछ लगावत बा'। आ एह बात के फसिला आज से ठीक बीस बरिस के बाद होखी”।

एतना कहके सीताराम ओजी से उठले आ अपना घरे आ गइले।

अब सीताराम अपना दुआर पर से धइले आगे जहां ले लउकत रहे ओजा तक के जमीन कीने लगले। बाकिर एह फेरा में ऊ अपना लइका पर से बेलकुल बेख्याल हो गइले। उनका त खाली रुपिया कमाए आ जमीन कीने के लगन लागल रहे। एकर परिणाम ई भइल की सीताराम के लइका के साथ-संघत बिगड़ गइल आ ऊ जवार भर के सबसे बिगड़ल आ आवारा लइका बन गइल।

ओने रामसेवक अपना लइका के पढ़ावे-लिखावे में विशेष धेयान देबे लगले। जेकरा से ऊनकर बेटा हर साल अपना इस्कुल में टॉप करे लागल आ एगो नामी यूनिवर्सिटी से पीएचडी कऽ के ओही यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गइल।

समय बीतल दुनु संघतिया आपन उमिर पूरा क के नोकरी से रिटायर हो के घरे लवटल लोग। एक दिन फेर सीताराम रामसेवक के दुआर पर अइले आ बहरिए से कहले

” काहो रामसेवक भाई, घरे बाडऽ का?”

सीताराम के आवाज सुन के रामसेवक अपना कोठरी में से दउरल कहत अइले

“हं सीताराम भाई बानी, आवऽ आवऽ बइठऽ”।

आ उनकर बांह पकड़ के उनका के अपना संगे दिवान पर बइठवला के बाद अपना मलिकाइन के कहले

“सुनऽ तारु हो, अरे सीताराम भाई आइल बाड़े तनी चाह-पानी के बेवस्था करऽ”।

फेर ऊ सीताराम से कहले, "कहऽ भाई आज अतना बरिस के बाद हमरा घर के डगर कइसे धरा गइल हऽ? आंय सभ कुशल से बानु? आउर बतावऽ तहार रुपिया के गाछ त अब फरे लागल होई?" आ मुस्कियाए लगले।

रामसेवक के ई बात सुनते सीताराम पूका फार के लइकन नियर रोवे लगले। उनकरा के रोवत देख के रामसेवक के अकबक हेरा गइल। ऊ अचकचा के उनका से कहले

“ए भाई! तुं काहे रोवे लगलऽ? हम त हंसी कइनी हऽ, काहे से कि बीस बरिस पहिले एही जगहा पर तुंही इ बात कहले रहलऽ।”

सीताराम आपन सुसुकी के रोकत आ अपना कान्हा पर के गमछी के कोर से आपन लोर पोंछत कहले

“भाई हो, आज तुं जीत गइलऽ हम हार गइनी। तहार कहनाम सही रहे कि 'पूत कपूत त का धन संचय,आ पूत सपूत त का धन संचय'। हम अपना भाई जइसन साथी से हारा-बाजी के फेरा में धन कमाए आ जमीन किने में अइसन अझुरइनी की अपना लइका पर धेयान ना दिहनी, जवना के कारण आज ऊ एक नम्मर के निकम्मा आ निशऽइल हो गइल बा। आ एगो तुं बाड़ऽ जे जर-जमीन ना किनलऽ बाकिर अपना लइका पर पूरा धेयान दिहलऽ त आज तहार लइका कामिल बन गइल आ संउसे जिला में ओकर नांव बा। हमरा के माफ कऽ दऽ रामसेवक भाई, हमार रुपिया के गाछ फरे से पहिलहीं सुख गइल, तुं जीत गइलऽ तहार गाछ ना खाली लगबे कइलस, ऊ आज संउसे बर के गाछ नियर होके लहलहात बा। तहार कहनाम सही रहे कि लइकन खातिर जर जमीन किनल आ धन जोगवला से कवनो फायदा नइखे। ओकनी खातिर कुछ करे के होखे त ओकनी के पढ़ा लिखा के योग्य बनावल ही रुपिया के गाछ लगावल होई।”
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लेखक परिचय:-
नाम: राम प्रकाश तिवारी
बेवसाय: सहायक प्राध्यापक,
आईएमएस, गाज़ियाबाद
गाजियावाद (उ. प्र.)

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