'गोपी गीत' में समकालीन जुगबोध - दिनेश पाण्डेय

श्रीमद्भागवत पुराण के दसवाँ स्कंध के ४६-४७ वें अध्याय में कृष्ण के उद्धव के जरिए गोकुल में सनेसा भेजे के प्रसंग बा। एह घटना के विस्तार दू तरे भइल, एगो उद्धव-गोपी के बतकही के रूप में, दोसरका एही दरम्यान बातचीत के जगह उड़ रहल एगो भँवरा के बहाने कृष्ण बदे ओरहना के प्रकटन के रूप में। एह पौराणिक प्रसंग के उद्देश्य सगुण-रसोपासना पद्धति के जरिए भक्तिनिरूपण रहल ह। एह प्रसंग के आधार बना के बाद के भारतीय साहित्य में एक परंपरा के विकास भइल। ब्रजभाषा के भक्तकवि सूरदास में एह घटना के सरूपगत आ भावगत फैलाव के चरम रूप दिखाई देला। विशुद्धाद्वैत के दार्शनिक सिद्धांत से उपजल पुष्टिमार्गी बिचार के मजगूती देवे बदे ई प्रसंग एकदम माकूल रहे जेकर वस्तु के आधार बना के अनेक रचनाकार लोग रचना कइल जवना में नंददास, प्रागन, जगन्नाथदास रत्नाकर, सत्य नारायण कविरत्न सरीखे कवि लो के अधिका महत्त्व प्राप्त भइल। एकर वजह इन्ह लोगन के काव्य प्रतिभा के उन्नत स्तर, भाव-सघनता, बिचार-सामरथ, युगबोध आदि रहल ह। इहे सब ओजह इन्ह रचनन में प्राप्त अंतर के रहलन। परंपरा के अलावे रचनाकार के प्रतिभा आ युगबोध के असर उनकर कीरति प पड़ल सुभाविक बा आ इन्ह मापनी प कवनो रचना के ताकत जाँचल-परखल जा सकेला। 
भोजपुरी लोकसाहित्य भा मुख्य साहित्यिक धारा में उद्धव-गोपी प्रकरण के आधार पर सिरजल सामग्री बाड़ीसँ बाकी ओमे ओकर खाँड़ा-टूकी रूप नजर आवेला। चौधरी कन्हैया प्रसाद 'आरोही' जी के 'गोपी गीत' भोजपुरी में एह परंपरा के नायाब आ समग्र रचना ह। महत्त्व एह बात के नइखे जइसन 'गोपी गीत' के संपादकीय में आइल बा कि कृष्ण सर्वोच्च ईश्वर रहन भा ओकरा से कमतर कवनो भगवान। 'यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति' के नजरिया जेकर आदर्श रहल ह ओह संस्कृति में एह विभेद के समुझावल सैद्धांतिक आ बेवहारिक दुन्नो नजरिए निरर्थक बा, कृष्ण त फिर भी कृष्ण रहन। गोपी गीत' में कृष्ण के अलम बना के जवन बात कहल गइल बा, महत्त्व तेकर बा, महत्त्व रचना में व्यक्त कृष्ण के स्वरूप के बा, महत्त्व गोपी लो के, उनकर प्रतिकात्मकता के बा, उनका माध्यम से व्यक्त भाव आ विचार के सत्यता आ प्रासंगिकता के बा। कवनो रचना पर आलोचक के आपन दृष्टि के आरोपन रचना के सही सरूप के पहिचाने में बाधक हो जाला। ईश्वर के अवतरण के अर्थ भौतिकता में ना बलु वैचारिकता में पेहम बा। साने गुरूजी के कहनाम कि "हाथ पर हाथ ध के बइठे से अवतार ना होखस। बिलोए बेगर नेउनो ना निकसे। बिना कष्ट उठइले काम ना होखे। कोशिश के पराकाष्ठा में अवतार के फल लागेला। हमनीं के मन के आशा, कामना जवन बेकती में उतरल दिखाई देवे ऊहे अवतार ह। हमनीं के मन के ध्येय, हमनीं के भावना, हमनीं के सुख-दुख आ हमनीं के मन के विचार जवना व्यक्ति में मूर्तिमान दिखाई देवे ऊहे अवतार ह।" एह वास्तविकता के ध्यान में रखले बेगर सिर्फ भटकावे हाथ लागी। सारा सगुनोपासना के विचार दर्शन भौतिक जथारथबोध के भीतर ईश्वर के मौजूदगी के अहसासे के बुनियाद प ठाढ़ बा। जदि मौलिकता में ईश्वर निर्गुण, निराकार हइयो बा त तुलनात्मक रूप से एह रूप में तेकर का उपयोग? “गोपी गीत में वर्तमान भारतीय त्रास के अभिव्यक्ति प्रदान करके सच्चाई के बेहद करीब पहुँचावे के प्रयास कइल गइल बा। जवन अनुराग बा ऊ मानव समाज के प्रति बा। ईश्वर के प्रति अनुराग नइखे व्यक्त भइल।”- ‘आपन बात’ में आरोही जी के एह कथन के असली तात्पर्य ऊ ना जे सतह प लउकऽता। बताईं भला, जेकर आग्रह ‘मानव आ मानव समाज के प्रति’ बा ऊ ईश्वर से बिमुख कहाँ भइल, एकरा उलट ‘मानव आ मानव समाज’ से बिमुख ईश्वर के अनुरागी कब भ गइल? अनुराग बा, व्यक्त नइखे भइल, एह बारीकी के बूझल जरूरी बा। एह ‘अनभियक्ति’ के पाछू समकालीन वैचारिकता के तरजीह देवे के कारन बा। 
श्रीमद्भागवत के कृष्ण ब्रह्म के वाचक हवें आ गोपी जीवात्मा के आ एही रूपकत्व प आधारित सारा कथात्मक तानाबाना बा। ईश्वर के गुन-सरूप के दर्शन कवनो काल बिसेखी के सीमित दायरा में ना कइल जा सके। हँ, जुग के मोताबिक नजरिया आ ता अनुरूप वैचारिक स्तर, भाषा, शैली आदि में फरक जरूर होखी आ इहे सहज, सुभाविक बा। भाव आ विचार के जुगसापेक्ष ना भइले एक असहज स्थिति कायम होई आ तेकर असर कम हो जाई। इहो हो सकेला कि तेकर उपयोगिते खतम हो जाय। पुरातन के सार्थकता तबे ले रहेला जबले ओकर प्रासंगिकता बरकरार बा, एकरा से कटल-टूटल चीज इतिहास के गर्त में गुम हो जाला। इहे कारन ह कि सुदीरघ अतीत के चरित नायकन के आधार बना के रचल कीरति में जुग के सोच के अनुसार बदलाव आवत जाला बाकी परंपरा के असर से ऊ पूरी तरे मुक्त कबो ना हो सके। 
'गोपी गीत' नाम में एगो वहम बरकरार बा, कम-से-कम आलोचना के पच्छ से ई बात त कहले जा सकेला। रचनाकार के आपन सोच आ चयन के आधार हो सकेला बाकी नाम के भीतर नामधारी के तलाश एक सामान्य आदत ह। एह प्रसंग के आदि सोत श्रीमद्भगवत महापुराण में उद्धव-गोपी संवाद (भँवरगीत) से अलहदा एक प्रसंग ‘गोपी गीत’ के बा जवन दशम स्कंध के एकतिसवाँ अध्याय में आइल बा। एह ‘गोपी गीत’ के प्रकरण अलग बा। शरद पूनो के महारास के अवसरि बा। एक कृष्ण अनेक गोपी, जुगल निरित उफान प बा। अब एकरा के अखिलकलादिगुरू के पदसंचार के कमाल कहल जाव, बेइंतहा आनंद में गोपी लो के सचेतना के लोप कहल जाव भा निगुढ़ आध्यात्मिक मनस के सर्वात्मबोध, हर गोपी के भुजपाश में कृष्ण के प्रतीति हो रहल बा। ए से गोपी लोग में एक अहंभाव चोर दरवज्जे घुस आवता कि कृष्ण के नजर में ऊहे सभसे सरेख बाड़ी आ कृष्ण के उनका प्रति अनुराग सबसे जादे बा। एह अहंबोध के धूंध में कृष्ण कहईं अलोपित हो जात बाड़न। श्रीमद्भगवत महापुराण के 'गोपीगीत' गोपियन के आकुल हिरदय के समवेत गान ह जवना में उनकर भरम के टूटे, जथारथ के ज्ञान, अल्पकालिक बिरह, अनुनय, स्मृति, कामना के बखान बा। गोपी गीत के उनइस श्लोकन में ईश्वर के पावे के अनेक राह में से अहं भाव के लोप आ दृष्टि बिस्तार के जरिए समूचे ब्रह्मांड में एक तात्विकता के दर्शन के बात मुखर बा। श्रीमद्भगवत महापुराण के 'गोपी गीत' प्रकरण में ऊधो के उपस्थिति नइखे। आरोही जी के 'गोपी गीत' के अधिकांश गीत में ऊधो के प्रति संबोधन बा, कृष्ण के मथुरा जाए के पीठिका बा एसे ई बात साफ बा कि ई 'गोपीगीत' उद्धव-गोपी संवाद प आधारित ह ना कि मूल 'गोपी गीत' प। 
‘गोपी गीत’ सूर सरिस अलगे-अलगे फूटल पद भा कहीं गीतन के संग्रह ह जे में कथात्मकता के विकास प कवनों जोर नइखे दिहल गइल। जाहिर बा एह तरे के प्रबंधमुक्त रचना में विचार के फिर-फिर दोहराव होई। इहाँ गोपी में बतौर बेकती कवनों पहचान बिसेखी कायम नइखे होत बलु उनुकर सहज रूपांतर वर्तमान सामूहिक संवेदना के वाहक के रूप में भ गइल बा। नंद-जसोदा, गोप-ग्वाल, राधा आदि के निजी मनोदशा के परगटन के बजाय समिलात सामाजिक भावबोध के अभिव्यक्ति प्रमुख बा। ‘गोपी गीत’ में अतिशय बेकतीगत भावुकता के जगह जथारथ लोकभावना के अहमीयत दिहल गइल बा। उद्धव के कहईं परतच्छ मौजूदगी नइखे, महज संबोधन से उनकर मौन श्रोता के रूप में होखे के अहसास उपस्थित बा। गीति तत्व के पसराव सगरे बा बाकि ओ में आत्मनिष्ठता के बजाय समष्टिमूलकता प्रबल बा। ‘गोपी गीत’ के रचना के उद्देश्य अगुन-सगुन वितर्क, ज्ञान-प्रेम भा जोग-भगती के टकराव, पुष्टिमार्ग के सरेखता के बखान नइखे, एकर मकसद वर्तमान जुगबोध, तेकर विसंगति आ ए से निपजल मानसिक हालात में सोच के दिशा के भीतर खोजल जा सकेला। खाली समस्या के बदरूप जथारथ सिरिजे के बनिस्बत मानुस जीवन के बेहतरी के प्रति ब्यापक नजरिया ‘गोपी गीत’ के आत्मा ह। 
‘गोपी गीत’ के शुरुआत में कुछ संकल्प बाड़ीसँ- 
“अँखियन से बादर अधरन से, 
पतझर मार भगाइब। 
छेदे पड़ी पाताल चीर आकास श्याम के लाई 
मुश्किल लाख कठिन कालो से मधुबन ना घबड़ाई 
असंतुलित डगमगात रथ, सीध राह पर लाइब।” (गीत- १) 
वास्तविकता त ईहे बा कि हालात ठीक नइखे। श्याम बिना वृंदावन के परिवेश दुखद बा बाकी नाउम्मीदी आ हताशा के जगह गोपी लो के मन में श्रम, निरभय, ‘संघर्ष आ लचर रथ के घिसल-पीटल चूल के फिर से दुरुस्त करे’ के प्रबल संकल्प बरकरार बा। अइसने इरादा सगरे आ बेरि-बेरि नजर आवऽता, कुछ बानगी- 
“झंझावात बवंडर तूफाँ, आई ना भय खाइब 
भँवर चीर मँझधार करेजा, नाव बढ़ावत जाइब।” (गीत- १७) 
“चमचमात आशा के सगरो, पाइब जहाँ निहारब 
पर्बत मिली कठोर राह में, ओकरो छाती फारब।” (गीत- ३५) 
“काम क्रोध मद तृष्णा तेजब, कतनो कष्ट उठाइब 
ज्ञान-चेतना ऊपर पर्दा आप डाल ना पाइब।” (गीत- ४२) 
“मिले मुक्ति विपरीत समर ना, श्यामें शयाम पुकारब 
समय बिषैला सदा दंश दे, बा विश्वास न हारब।” (गीत- ४५) 
रचनाकार के आपन विजन बा आ ए के लेके कवनो ऊहापोह नइखे जनात। खलिहे समस्या के अंबार रख देल कवि के ध्येय नइखे, सरब नकार के मनोवृति के बरा के हकीकत के स्वीकार आ बेहतरी के आदर्श के खोज के बेचैनी के ‘गोपीगीत’ में सिद्दत से महसूस कइल जा सकेला। भीतर के वृंदावन कबो ना दरके, भलहीं अनगिन चोट पड़े। बदतर हालात के ओजह आपसी भीतरघात बा। सब खुराफात के जरि के रूप में स्वार्थी अर्थतंत्र के भूमिका के पहिचान करत एकर दबाव के कम करे आ जन-जुड़ाव के मजगूत करे के राह के सेवाय कवनो चारा नइखे (गीत- २)। कृष्ण के जरूरत काहे बा? एक अइसन व्यक्तित्व के आदर्श के जनकामना जेकर नेतृत्व जुग-जुग के सामूहिक आकांक्षा के पूर्ति करे, लोक चेतना के सही दिशा में मोड़ दे आ तेकर संजुक्त शक्ति के संधान से सारी नकारात्मकता के जरि खोद दे- 
“बैरी के नापाक इरादा, खाइत जल्दी मात 
मधुवन मूल्य घटावत निसिदिन, मौजूदा हालात 
आरोही बिन श्याम अपाहिज, मधुवन सुबहो-साम।” (गीत- १८) 
निरा कामना से बात बनी थोरे? सरब-समरथ ईश्वर के चाह आ सारी जवाबदारी तेकरे प डाल के निहचिंत हो जाए के सोच राह के भटकन ह एह बात के जतिने जल्दी समुझ लिहल जाव त ठीक। कन-कन में मौजूद कृष्ण के सक्रियता लोक के माध्यम से ही व्यक्त हो पावेला ए से जन भागीदारी के बेगर बेहतरी के कामना के कवनों मतलब ना। सहयोग, सक्रियता आ निरंतरता सामाजिक उठान के अनिवार शर्त ह। इन्ह पाँतिन में छिपल अर्थ प ध्यान दिहल जाव- 
“बदहवास बेचैन समय के, करत आप से बात 
सामूहिकता साथे निजता, होत हवाई जात 
आरोही खुशहाली लागी करब जंग अविराम।” (गीत- ४०) 
विश्व बेवस्था में जवन सकारात्मक बा, सुखद बा, दिव्य बा तेकर समावेश ईश्वरत्व में हो जाला। ईश्वरत्व के अधिकाई के चाह आदर्श ह। तेकर सक्रिय मौजूदगी आनंदलोक के सिरिजन क जाला तेकर बिलगाव कलेस दे जाला- 
“एक समय ऊ रहे श्याम मन भीतर कइलन वास 
शस्य-श्यामला मधुवन धरती बाँटत रहे सुबास 
ओढ़ उदासी बइठल मधुवन गर्द आलता साज।” (गीत- ४३) 
संसार में शुभ-अशुभ, रूप-विरूप, नीक-जबून सबके मौजूदगी बा। सिर्फ विरूप जथारथ के मेंहि बना के तेकरे चक्कर कटले आदिमी जीवन के व्यापक पहलू से अजाने रहि जाई। मानुस सहज रूप में कल्पनाजीवी ह। ‘गोपी गीत’ के गोपियन के मानीं त जागतिक वास्तविकता के आदर्श सरूप के अंगीकार जीवन के ध्येय होखे के चाहीं- 
“अंग-अंग बिन श्याम अपाहिज, ना तनिको उत्साहे 
आसमान तज घेरा अंदर, चिरई रहल न चाहे 
जे ना नाचल मोहन साथे का मोहन के जानी।” (गीत ३) 
भारतीय लोकसंस्कृति के मूल सुर आशावादी बा। निहिचे जानीं कि जथारथ के भीतर विरूपता, विकृति, विसंगति, दुखात्मकता के गुन व्यापक बा बाकी आशावादी नजरिया सबन के नजरअंदाज क के उन्नति के राह आसान क देला। ‘गोपी गीत’ में उम्मीदी के तत्व कहईं छूटत नइखे। इहाँ गोपी लो के चरित्तर के गठान में हताशा, निराशा, टूटन जइसन दुखात्मभाव के जकड़न नइखे। कुछ बानगी- 
“बरसत रहत मेघ निसिवासर, माघ पवन उत्पात 
बा पुरहर विश्वास श्याम अइले बदली हालात। 
बीतल समय साथ मन रसिया, बिसरत ना अधिकात 
मनमोहन के सफल वापसी, होई मानी बात।” (गोपी गीत ४) 
“ऊधो कायम रही उम्मीद।” (गोपीगीत ६) 
“कइले कुब्जा पंजा में बेजारे ऊ जर जाई 
लौट गइल खुशहाली आई, सब दुख दर्द पराई 
भीतर जलन न बाहर धूआँ, ना अइहें डहकइहें।” (गोपी गीत ११) 
“असफलता के बादो आवे, विजय भोर जीवन में 
महाप्रलय आसार हमेशा, रही न वृंदावन में 
उलझल ममिला सुलझावे के चाहब होखी बात।” (गोपी गीत ४६) 
जहाँ टकराव अथवा कष्ट पहुँचावे के एकमात्र उद्देश्य होखे वइसन स्थिति के छोड़ के कवनों गलतफहमी के अंत भा अंतर्विरोध के बीच तालमेल कायम करे बदे संवाद सटीक माध्यम ह। उधो के दिहल संबोधन में गोपी लो के कहनाम कि- 
“अनुचित साथे भइल होय तब, सहज राह बतलइतीं 
हमनी के मोहन करीब जइसे होइत पहुँचइतीं 
उभरल खड़ा सवाल सामने मारीं फूँक भगा दीं।” (गोपी गीत २५) 
“रहत सदा बेचैन बनवले, भागी अंतर्नाद 
वृंदावन के कुंज-कुंज में, गूँजी फिर संवाद।” (गोपी गीत २६) 
सूरदास जी के ‘भ्रमरगीत’ के गोपी भावुक आ संवेदनशील बाड़ी, नंददास के ‘भँवरगीत’ के गोपी तार्किक आ प्रगल्भ, ‘गोपी गीत’ के गोपी में बौद्धिकता आ विचारशीलता के तत्त्व अधिका बा। पहिले के दूनो रचनन में दार्शनिकता आ सगुण भक्ति के सिद्धांत के निरूपण के उद्देश्य बा ‘गोपी गीत’ में समकालीन चेतना के प्रस्तुति। ‘आपन बात’ में खुद कवि के हामी बा कि “गोपी गीत में गोपी कृष्ण के पौराणिक मिथक के परंपरागत आ निर्जीव आवृति ना कर के समकालीन भारतीय जीवन के अनुरूप मानवीय धरातल प चिन्हित कइल गइल बा।” जाहिर बा प्रकरण भलहीं पौराणिक लिहल गइल बा सारा व्यक्त भावबोध आधुनिक बा। ‘गोपी गीत’ में युगीन जथारथ, तेकर नकारात्मकता (गीत सं ५, ७, ८, ९, १२, १३ आ ४८), चिंता (गीत सं ३०, ३१), असहमति (गीत सं ३३, ४७), सवाल (गीत सं ३८), असर (गीत सं ३९, ५२), हताशा (गीत सं २४), दृढ़ता (गीत सं ४१), उद्वेग (गीत सं २०, २१, २३) आदि के स्तर खालिस आधुनिक बा।
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लेखक परिचय:-
नाम - दिनेश पाण्डेय
जन्म तिथि - १५.१०.१९६२
शिक्षा - स्नातकोत्तर
संप्रति - बिहार सचिवालय सेवा
पता - आ. सं. १००/४००, रोड नं. २, राजवंशीनगर, पटना, ८०००२३
मैना: वर्ष - 7 अंक - 120 (अक्टूबर - दिसम्बर 2020)

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