चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह 'आरोही' - सुभाष पाण्डेय

हमरा जइसन निपट सोझबक अदिमी का बिराट ब्यक्तित्व चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह 'आरोही" जी पर कुछुओ लिखल सूरुज के दीया देखलवला जइसन बा। ए से कि कहाँ ऊ भोजपुरी के अनन्य सेवक, काव्यकला के कुशल मर्मज्ञ आ तन मन से सभकर हित सोचेवाला आ ए सब के अपना क्रियाकलाप में सामिल करेवाला आरोही जी आ कहाँ हम? जेकरा ओ महान आतमा के दरसन के सौभाग्यो नइखे मिलल।
लेकिन, कहल जाला नू कि कवनो कालखंड के जानकारी ओ बेरा का साहित से पता चलि जाला। ओसहीं, हमरा लगे आरोही जी के स्वनामधन्य सुपुत्र कनक किशोर जी के डाक से भेजल चारि गो किताब बाड़ीसँ। जे में तीनि गो आरोही जी के लिखल ह आ ए गो किताब में बहुत बड़े- बड़े लेखक/ कवि सभ आरोही जी का बिषय में आपन संस्मरण आ बिचार दिहले बा। जवना के पढ़ला का बाद उहाँ का बारे में बहुत अन्दाजा लागल, समुझे में त पूरा जीवन खपावे परी। आरोही जी के लिखल पच्चीस किताबन में जिनिगी के केतना रंग छिटाइल होई, ई त पढ़ला का बादे पता चली। लेकिन ए किताबन के पढ़ि के जवन बुझाइल, ऊ लिखे के कोसिस करतानीं।
आरोही जी "अजस्र धारा" की भूमिका (जवना के शीर्षक "बाकलम खास" बा) में अपना सुभाव आ अपनी रचनन का बारे में बहुत कुछ इसारा कइले बानीं। जवना से बुझाता कि आरोही जी अपना कार्यकाल में एगो कड़क प्रशासनिक अधिकारी का साथे हर हाल में नरमदिल आ भोजपुरी खातिर कवनो हद ले जाएवाला अदिमी रहनीं।
भोजपुरी में अरबी, फारसी भा दोसरा भाषा का सब्दन का प्रयोग पर उहाँ के बिचार एकदम साफ बा। उहाँ का साफ साफ लिखतानीं कि गंगा खाली अपने पानी ले के सागर ले ना जाली। पानी में घुसल- बसल चीनी- निमक के बिलगावल आसान हो सकेला, लेकिन कवनो भाषा में घुसल- बसल सब्दन के बिलगावल आसान नइखे। सम्भव होखे त भोजपुरी के भंडार नया- नया सब्दन से भरे के चाहीं। पर्यायवाची सब्द बढ़लहीं भोजपुरी के बिस्तार हो सकेला। भाषा पर उहाँ के ई बिचार एह समय के कवि/ लेखक (जे सब्दन के ले के द्वंद में परि जाला) लोग खातिर सरल राह बतावता।
उहाँ के साहित्य जनता से जुड़ल बा, जवन साहित्य के प्रधान गुन ह। उहाँ का अपना पूरा साहित्य में मानवता पर, अभाव में परल लोगन की तकलीफ पर केतना जोरदार पक्ष ले के आपन कलम चलवले बानीं ओकर बानगी देखीं:-
हम पानी बिन तरसीं, भर दिन रात।
रउरा घर के भीतर, सागर मात।
राजनीति पर उहाँ के दू टूक कहनाम पढ़ीं:-
राजनीति ना जनता से खेलवाड़।
कविता ना सब्दन के झाड़ झंखाड़।
राजनीति के माने खींचल टांग।
मंत्री सुनल न चाहे जनता मांग।
उहाँ का राजनीति से कला के अलगे राखे के सलाह बा:-
राजनीति से होखे कला बिसाक्त।
राजनीति के भूलल मुस्किल बात।
सबकुछ लिखले बानीं, आरोही जी। लेकिन, कब्बो आपन मूल नइखीं छोड़त। अपना मूल आ मूल्यन से उहाँ का केतना लगाव बा, एकर बानगी उहाँ के लिखल एकांकी संग्रह "धर्मी" का "दुर्लभ बस्तु" एकांकी का अन्त में एकदम्मे अस्पस्ट आ उजागर हो जाता। 
(च्यवन ऋषि का सामने राजा नहुष बइठल बाड़न।)
राजा- ऋषिवर! हम राउर मूल्य चुकता कर देनीं।
च्यवन- कS करोड़? कS अरब?
राजा- महाराज! अरबो- खरब से जेकर मूल्य ना चुकावल जा सके अइसन दुर्लभ बस्तु। गाइ, हम रउवा बदला में दिलवा देनी हां।
च्यवन- तू उचित कीमत दे देलS। हम गाइ से अधिका मूल्यवान कवनो बस्तु एह संसार में नइखीं देखले।
"गोपी गीत" में ऊधो- गोपी संबाद से जवन कड़ुआ सच्चाई कहि दिहले बानीं ऊ खाली भोजपुरी ना बलुक हर भाषा का साहित्यकार लोग खातिर एगो राह देखावता। बात केहू से होखे, कवनो होखे, मानवता के ना होखे त बेकारे बुझीं। आरोही जी अपनी रचनन में मानवता के तनिको ओझल नइखीं होखे दिहले। देखीं:-
ऊधो! मन पिंजड़ा के मैना।
केकर मंतर मारल बोलीं, माथे गिरल बजर बा
रहीं लगवले उल्फत-पौधा, नफरत फुलल फरल बा
आजो खोजे साँझ- सबेरे, मनमोहन के नयना।
कोना- फेंकल सच्चाई बा, झूठा राज करेला
सिंहासन मनमोहन खाली, रातो दिवस रहेला
जाते जात कहब कुब्जा से, मारब ना हम बयना।
श्याम समर्पण काम न आइल, रहे रात भर घाम
सगरो गाछ बबुर फुलाइल, भइल अलोपित आम
"आरोही" मुरली पीताम्बर, सनल सुधा-रस बयना।
आरोही जी के थोरे- बहुत रचना पढ़ि के उहाँ का बारे में हमरा लिखे में तनिको हिचक नइखे कि उहाँ का सबसे पहिले मानवता आ सच्चाई के पक्षधर रहनीं, भोजपुरी खातिर हद दरजा के आग्रह से भरपूर। एकरा समरथन में हम उहें के कहनाम सभका सोझा जस के तस राखल चाहबि। ए पाँतिन से भोजपुरी खातिर काम क रहल सगरे संस्थन का भोजपुरी आंदोलन आ ओकर इस्थिति समुझल आसान हो जाई:-
'हम पढ़ले रहीं कि कवनो आंदोलन के कार्यकर्ता लोग बूढ़ा जाला तब ऊ आंदोलन जवान होला बाकिर भोजपुरी आंदोलन के देखत बानीं कि जब एकर कार्यकर्ता लोग बूढ़ा- बुजुर्ग भइलन तब इहो भउसल बूढ़ बैल अस साँसो लेवे में, चले के के कहो उठहूँ बइठे में कठिनाई महसूस करि रहल बा। .....एकरा से कवनो लेखक के साहित्यिक भा सामाजिक जीवन में भोजपुरी आंदोलन मददगार नइखे बनल बाकिर जब तक कवनो कारगर विकल्प नइखे तइयार हो जात जवन बा तवन बचवले में अक्लमंदी समुझल जाई।'
आरोही जी आदर सहित नमन।
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सुभाष पाण्डेय
प्रधान सम्पादक, सिरिजन, भोजपुरी पत्रिका।
मुसेहरी बाजार, गोपालगंज, बिहार।








मैना: वर्ष - 7 अंक - 120 (अक्टूबर - दिसम्बर 2020)

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