पुस्तक समीक्षा: भोजपुरी के पहिल डायरी ‘नीक-जबून’: संस्कृति के सुरक्षा कवच - पंकज तिवारी

डायरी लिखीं कि ना लिखीं ? लिखब त साँच लिखे के परी। बिना कवनो लाग-लपेट के, बिना कवनो अलंकार-शृंगार के लिखे के परी। मन में कुछ दिन तक उधेड़-बुन चलल होई आ ओकरा के जितला के बादे ई डायरी लिखाइल होई। भोजपुरी के कुछ वरिष्ठ साहित्यकार लोगन से जब हम जानकारी लिहलीं त पता चलल कि डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल द्वारा लिखित ‘नीक-जबून’ भोजपुरी के पहिलका डायरी-संग्रह हटे। हम एके बार बइठकी में ई किताबिपढ़ि गइलीं। नीक-जबून के विधा भलहीं ‘डायरी’ बाटे, बाकिर एकर कथात्मक शैली हमरा के एतना प्रभावित कइलसि कि हमरा तनिको उरेब ना परल, हमरा पढ़े के प्रवाह कहीं से कम ना भइल। 

डायरी लिखला के काम पथरीला, कँकरीला जमीन प आँचवाली दुपहरिया में चलला के काम होला आ एहसे ओहमें कहीं-कहीं नाहिंयो पसन्न परेवाला सामग्री जरूर होले, जहाँ पहुँचिके पाठक या त नाहीं त किताबि बन्न क देला। बाकिर एह किताब में विमल जी के लेखनी कामाल के जादू बिखेरतिया। एहमें कवनो संदेह नइखे कि एकरा में बेलकुल खर बात बतावल गइल बा, मिठका-मिठका गप्प, कड़ुआ-कड़ुआ थू, जइसन बात एहमें नइखे। 

एक दिन के डायरी "चलीं, भोजपुरिये में नेवता लिखल जाव" शीर्षक के लिहीं त एहमें एगो रिक्सावाला भाई से भइल बतकही भा पाण्डेय जी से इसऽरे-इशारा में भइल बात आ ओकर एतना झट से बड़ नीमन असर देखेके मिलल कि मन मगन हो गइल। ओह पूरा बात से त हमहूँ सहमत हईं आ एकरा माध्यम से ई बतावल चाहत हईं कि हमरे घरे अब जो कवनो शादी के निमंत्रण लिखाई त भोजपुरिये में लिखाई। 

लेखक भाषा का प्रति बहुत सजग लउकता। डायरी का एह अंश से ई साफ-साफ बुझाता। 

"कुछ दिन पहले कोलकाता के एगो प्रसिद्ध अखबार के विशेषांक के मुखपृष्ठ पर बड़-बड़ टह-टह लाल अक्षरन में विजयदशमी पढ़लीं। मन अचकचाइल। बहुत दिन बाद कवनो बुद्धिजीवी कड़ा इस्टेप उठवले बा अपना पूर्वजन पर। आखिर गलत चीज के कब ले झेलत रही आदमी आ ऊहो मीडिया से जुड़ल आदमी। ताकत आ प्रभुत्व के खुशबू से गमगमात मन शांत कइसे बइठी। एक मन कहलसि कि प्रूफ के गलती होई। दोसरका मन कहलसि कि देखत रहिह, एक दिन 'एकादश' का जगहा 'एकदस' लिखल पढ़ेके मिली। त हम का करीं ? मए गिनती आ पहाड़ा ठीक करे के हमरा के प्रभारी बनावल गइल बा ?” 

विजयदशमी आ विजयादशमी का फर्क के माध्यम से लोग कवना तरे मूल शब्द के साथ खेलवाड़ कइ रहल बा, कवना तरे आज का लेखनी में, भाषा में एतना बड़ घाल-मेल चल रहल बा, एकर विरोध 'ये दिल माँगे मोर' पर भइल उनकरा बहस का माध्यम से समझल जा सकता। "हम कहलीं, भाई 'मोर' के जगहा 'और' कहलो पर त कुछ बिगड़ी ना। फेर काहें एकर ओकालत करतारे लोग। हर भाषा में लीखे-पढ़ेवाला लोग विदेशी शब्दन का मोड़ पर कुछ देर रुकिके सोचेले, काहेंकि धड़ल्ले से एकर प्रयोग कइला के मतलब बा व्यंग-बौछार का शुरुआत के नेवता। इहाँका इंगलैंड में पैदा भइल रहीं...जी, एंग्लो इंडियन हंई... इहाँ का लेखन पर उत्तर आधुनिकतावाद के असर बा...। एह तरह के जुमलन के अलावा कुछ ना मिली त एगो बिदेशी मीडिया के दिहल अपमानजनक शब्द 'हिंगलिश' त जरूरे सुने के मिल जाई। हमरा सबसे खराब हिंगलिस लागेला जवना के चार भाग में एक भाग हिंदी (हिं) आ तीन भाग अंग्रेजी (ग्लिस) बा"। एहमें उहाँका एह शब्द के गलती से भा जान-बूझिके ओकालत करेवालन के नीमन से धोअले बानी। अक्षर-अक्षर आ शब्द-शब्द के एतना नीमन व्याख्या कइल गइल बा कि उहाँ का पैनी दृष्टि के कायल भइला से केहू अपना के रोकि नइखे सकत। 

परिवार आ समाज में दू भा तीन गो पीढ़ी का बीच के जवन खाई बा, ओकरा प एतना नीमन चिंतन एहमें मिलता कि लागता कि ई किताब घर-घर में होखेके चाहीं। एह किताब में बहुत नीमन-नीमन विचार त मिलते बा, ओकरा सङहीं संस्कृति में गलती से दोहरावल कुछ बातन पर भी लेखक के लेखनी मानल नइखे। ऊ ई बतावल आपन धर्म समझतिया कि हमनी से चूक कहाँ भइल बाटे। एह डायरी के हर बात हवा-हवाई ना होके वैज्ञानिक तरीका से राखल गइलि बा। उदाहरण का रूप में छठ पूजा में सबका जबान पर बइठल ‘रसियाव’ शब्द के लिहल जाव- लेखक अपना स्टाफ रूम में मगन होके गुनगनात रहीं- 

"ननदी का बोलिया में बने रसियाव रे 

सरगो से नीमन बाटे सइँया के गाँव रे।“ 

गीत सुनला पर ओहिजा हाजिर लोगन के बीच चर्चा शुरू हो गइल कि 'रसियाव का हटे'। खीर के पुरान रूप कहिके ओकरा के गइल-बीतल बतावल जात रहे। हमरा ई जमल ना। ई कहनाम ह विमल जी के आ आगे ओनहीं का शब्द के जस के तस देखल जाव- 

“पहिले के बात आ परम्परा सभ आउटडेटेड कइसे हो जाई भाई ? चाउर में गुर डालिके सिंझावल जात रहे, ओमें दूध ना डलाइ। एकरे के रसियाव कहल जात रहे। सभसे बड़ आपत्तिजनक बात रहे ओह घरी दूध का अभाव के। अब ई कइसे मानि लिहल जाव ? आजु भलहीं गाँवों में दूध मिलल कठिन हो गइल बा, बाकिर पहिले त स्थिति उल्टा रहे। पहिले दूध-दही के कहाँ कमी रहे ? हम आपन पक्ष रखलीं आ कहलीं कि छठि में त खीर ना रसियावे के महातम हटे।" आगे पढ़ला के बाद ऊ चर्चा सार्थक बहस में बदलि गइल बा आ बहुत जरूरी चीज छन के बाहर आइल बा- “रसियाव में दूध डाले के रिवाज पहिले ना रहल।“ काहें ना रहल एकर वैज्ञानिक विवेचन भी बा एंह बहस में, संस्कार आ संस्कृति पर भी अच्छा बहस भइल बा। हँऽ एगो बात हमरा खटकल कि एंह बहस का साथे गीत में आइल भाव पर चर्चा ना भइल, जो भइल रहित त मन जुडा़ गइल रहित। 

एह तरह के एगो गीत हमरो इयाद आ रहल बा, गीतकार शायद मिर्जापुर के हवें- 

रुनुक-झुनुक बाजे पायल तोर पउँवा 

बड़ा नीक लागे ननद तोर गउँवा 

प्राचार्य डॉ. संजय सिंह 'सेंगर' के दरियादिली एह डायरी के एगो विशेष आकर्षण बा। ई त निश्चित रूप से हर आदमी के पढ़ेके चाहीं। अब लेखको लोग सवाल का घेरा में आ गइल बाड़न, लेखक द्वारा उठावल गइल ईहो विषय बिलकुल सही उठावल गइल बा। कुछ प्रश्न त अबहिंयो बा, जेकरा से लेखक लोग पल्ला ना झाड़ि सकेलन। भोजपुरी में अश्लीलता जइसन बिषय पर भी एहमें एगो सार्थक चिंतन पढ़े के मिलल बा। ‘अपने घर में बन्न’ में आधुनिकता का नाँव पर सवार भौतिक सुख कबो-कबो जीवन खातिर कतना क्लेश बन जाला, एह पर गज़ब के सटीक व्यंग बाटे। 

"राखी भाई-बहन के तेवहार कब से" शीर्षक में नवका पीढ़ी के भटकल ज्ञान के जगावे के जबर प्रयास भइल बा। जातिवाद पर लिखल लेखक के बात त जइसे पूरा किताबे प भारी लागत बा। आईं, दायरी के कुछ अंश जस के तस पढ़ल जाव- 

“प्रदूषित वातावरण में फइलल जुमलन का जगह मेहनत के जरूरत बा, तबे गंभीर चिंतन के विकास होई। पहिले भारतीय संस्कृति के चरित्र के समुझे के चाहीं आ तब ओकरा कसौटी प कसिके देखेके चाहीं कि अपने के जवन सोच रहल बानी, ऊ सही बा कि ना। हमरा भारतीय संस्कृति के आदर्श श्रीराम शबरी के जूठ बइरि खातरन त उनकर चरित्र लिखेवाला महर्षि बाल्मीकि का छुआछूत के बात करिहन ? महर्षि वेद व्यास के इतिहास केकरा ले छीपल बा ? अब अपनहीं बताईं कि का श्रीमद्भागवद्गीता कवनो खास वर्ण खातिर अस्पृश्य हो सकता ? अरे भाई, ओकर त न्यायालयो में कसम खाले लोग। जवना हिंदू संस्कृति में फेड़ के पतइयो तूरे खातिर फेड़ प चढ़े से पहिले ओकरा के प्रणाम कइल जाला आ ओकरा से अनुमति माङल जाला कि हम अपना जरूरत खातिर राउर पतई तूरल चाहतानी, ओह संस्कृति में केहूँ के दुखी करे के निर्देश ऋषि लोग कइसे दे सकतारन ? ई विशुद्ध काल्पनिक बा आ बाद में जोरल लागता। साँच त ई बा कि हमरा समाज आ संस्कृति में जब-जब कवनो प्रकार के खराबी आइल बा, त ओकरा के ठीको कइल गइल बा। एहू तरह के गड़बड़ियन के दूर कइल जाएके चाहीं अउर प्रतिभाशाली लोगन के आगे बढ़िके शोध आदि का माध्यम से ओह तथाकथित ग्रंथन में संशोधन-परिवर्धन करेके चाहीं।” 

कुल मिला के कहल जा सकेला कि ई किताब पढ़ला से इहे अहसास होता कि हम एगो किताब से ना बलुक एगो संस्कार अउरी संस्कृति से लैस समाज के यात्रा कर रहल बानी, जवना में रहता से भटकल लोगन के भी सुधरे के मौका कदम-कदम प देबे के परयास भइल बा। साँच पूछीं त ई भारतीय संस्कृति के एगो सुरक्षा कवच बा। 

किताबि के नाम : नीक-जबून 
विधा : डायरी 
लेखक : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल 
प्रथम संस्करण : 2019 
ISBN : 978-81-944361-1-9 & 978-81-944361-0-2 
पृष्ठ : 120 
मूल्य : 220/110 रुपए (सजिल्द/अजिल्द) 
प्रकाशक : नमन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रिब्यूटर्स, कानपुर।
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पंकज तिवारी
नई दिल्ली
9264903459









मैना: वर्ष - 7 अंक - 118-119 (अप्रैल - सितम्बर 2020)

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