बड़की भउजी - सीमा मिश्र

कमली कई बरिस बाद आज ससुरा से अपना गाँवे आइल बिया। ओकरा खुशी के ठेकाना नइखे। आवते गाँव-घर घूमे निकल परलि। छोट-बड़ सभकर हाल-चाल पूछत कई घंटा बाद घरे आइलि। आवते पूछे लागलि- “ए भउजी, का खाए के बनल बा ?” 
“सभ तहरे पसंद के बनवले बानी। कबे ले तहार राहि ताकत रहलीं हा।” खाना खाके ननद-भउजाई का बीचे बतकही शुरू हो गइल। टोल-मोहाल के हाल-चाल। केकरा घरे के बा, कहाँ बा, कइसे बा। बाते-बात में कमली पूछ दिहली- “ए भउजी, बड़का घर के का हाल-चाल बा। के-के बा एहिजा ?” 
“बा के ? खाली एगो मझिलो बाड़ी एहिजा।” चाचीजी का मरला का बाद त बड़को एके-दू बेर अइली। 
“आ बड़का भइया ?” 
“हँ, ऊ आवत रहेले।” 
“कहत रहे लोग कि ऊ लो’ अब घर-परिवार के नइखे देखत। बड़का भइया कमातरे आ खाली अपने परिवार का बारे में सोचतारे।” 
“ना ए बबुनी, ई जे कहता ऊ एकदमे गलत बोलता। आजु का जमाना में अइसन भाई-भउजाई मिलल मुश्किल बा। हमरा आजो इयाद बा कि जब बड़ जाना के बियाह भइल रहे, ओ घरी शोर भइल रहे कि ओतना बढ़िया घर के लइकी आ पढल-लिखल कइसे गाँव में आ माटी का घर में रही। बाकी ई कहाउत सहिये बा कि बड़का के धियवा के पेट बड़ आ छोटका के धियवा के ठेस बड़। 
“एकर माने का भइल ?” 
“बड़को का बेवहार से कबो ई ना लागल कि ऊ पढ़ल-लिखल होके गाँव का लोग के खुशी के खियाल नइखी रख सकत। चाचीजी जवने हाथ प दे दीहें, ऊ कबो ई ना कहिहें कि हम ना खाइबि भा हमरा नीक ना लागे। उनुका सामने चाचीजी के केहूँ बोल देव त ऊ तुरत बोल देत रही कि अइसे ना बोले के चाहीं। उहाँका माई हईं आ माई का साथे अइसन बेवहार ना करेके चाहीं। चचोजी के ऊ खूब आदर करत रहली। बाकिर चाचाजी, जो कबो चाचीजी के केहूँ का सोझा डाँटि देत रहीं त उनुका बहुत तकलीफ होत रहे। कमो पइसा में परिवार कइसे चलावल जाला आ ओकर हौसला ना टूटे, ई केहूँ उनुका से सीखे। जवना घरी बियाह भइल रहे ओ घरी कतना पइसा मिलत रहे.. एक हजार रुपया। बड़का घर एह से कहात रहे कि ओ घर में सभ लोग पढल-लिखल आ सभे विद्वान रहे। बाकिर, गरीबी जी के किरिपा ओ घर पर कम ना रहे। चचो जी ईहे चाहत रहीं कि बबुआ के बियाह कई दिहलीं, अब साथे परिवार ले जासु। बेटा के खइला-पियला के चिंता त रहबे करे कि अकेले कइसे खइहें-पीहें बाकिर ओकरा पीछे एगो ईहो कारन रहे कि नया कनिया-बहुरिया का रहे लायक ओइसन घरो-दुआर ना रहे। देखीं बबुनी, ईहे संस्कारी परिवार के लइकी कहाले कि ओकरा घरे कई किलो तेल आ कई किलो चीनी आ केतना कवन समान आइल, कबो हिसाब ना रहल। ऊ अब एइजा आइल त सइ ग्राम तेल खरीदल देखिके ओकरा प का बीतत होई, अनुमान कर सकतारू। बाकिर तबो नइहर के लोग का सोझा कबो खूले ना दिहलस कि हमनी का अतना अभाव मे जियतानी जा। जे आवे ओकर खूबे खातिर-भाव होखे। ऊ कबो चूल्हा का पँजरा ना गइल रहे बाकिर चुपचाप गोइँठा आ रहरेठा जोरिके खाना पकावे शुरू कइलस। बियाह का बाद तीन-चार महीना गाँवे प रहली बाकिर कबो केहूँ से शिकाइति ना कइली। उनुका मन में रहे कि केहूँ से कुछ कहब त लोग ईहे कहिहें कि माई-बाबू बियाह काहें कइलन हा अइसना घर में। माई-बाबू के केहूँ कुछो मत कहो, एह डर आ लेहाज से सभ कुछ अपने पीके रहि जात रही। सास, ससुर, देवर, ननदि- सभकर खियाल राखत रही, केहूँ से कवनो भेद-भाव ना।” 
बड़कू उनुका से कहले कि हम चाहतानी कि हमरो परिवार ढंग से रहे। सभकर रहन-सहन आ बोल-चाल में बदलाव आवे, एकर जिम्मा तहरे प बा। ऊ कहली कि रउँवा चिंता मत करीं। जइसे ई लोग राउर भाई-बहिन ह लोग ओसहीं हमरो ह लोग। आ एह बात के चिंता कइले बिना कि हम ओ लोग के टोकब कि अइसे रहीं जा भा अइसे बोले-करे के चाहीं त ऊ लोग का कहिहें, हमेशा उनुकर ईहे कोशिश रहे कि सभके रहन-सहन, बोल-चाल, सभ स्टैंडर्ड होखो, सभ एक दोसरा से मिल-जुल के रहे। सभके एक दोसरा खातिर प्रेम-भाव बनल रहे। एहसे ऊ देवरो लोग के टोकत रहिहें कि अइसे ना हइसे रहेके चाहीं, हइसे बोलेके चाहीं। उनुका दिल में कल-छपट ना रहे। अऊरू ना त गाँव-घर का बारे में अतना पता रहे कि ससुराल में अइला का बाद गलतो भइला प सभ में हाँ कहत रहेके बा अउरू सभके जी-जी करत रहेके बा। जानते बानी कि देहात में केहूँ टोक-टाक करत रहो त लोग कही कि देख, बड़-जेठ के जमला के कइसे बोलतिया फलनवा बो। ओकरा तनिको सहूरे नइखे बोले के। बड़-जेठ के जमला के अइसहीं बोलल जाला ? 
भउजाई गंभीर हो गइल रही। उनुकर मन भरि आइल। 
बबुआ जी भा बूची जवन कहि दिहल, ऊहे ठीक बा। चाचीजी एकदमे सिधवा रहलीं। जे जवन कहि दे, ओकरे के सही मान लेत रहीं। लोग कहिहें कि देखिह ढेर माथा प जनि चढ़इह। काम-धन्हा कूल्हि करवइह। बाकिर तबो उहाँका पतोह के अकेले ना छोड़त रहलीं। एहसे लइकियो लोग चिढ़ल रहत रहे कि इनका शांति से बइठिए ना जाला, पीछे-पीछे लागल रहिहें। पतोहो आइल त ई बइठि के ना रहिहें। अइसन ना रहे कि बड़को सुनत ना रहली सभके बात बाकिर अतना गंभीर रहली कि सुनिओ के चुप रहिहें जइसे सुनलही नइखी। जब लइकी के बियाह हो जाला आ ससुरा में ओइसन बाताबरन आ रहन-सहन ना होला जवना में ऊ रहिके आइल बिया, त सोचीं, ओकरा खातिर ओकर जीवन केतना कठिन हो जाला जीयल। ओहू पर जब परिवार का लोगन में ओकरा खातिर सहानुभूति ना होखे कि ई अतना एडजस्ट क के रहतिया, ईहे बहुत बा, तब तकलीफ ढेर होला। ए बबुनी असहीं ईहे सोचत उनुकर दिन बीतत रहे कि अब केहूँ के कवनो तकलीफ मत बीतो। 
अइसने में छुट्टी का बाद बड़कू पहिल बेर परिवार बाहर ले गइले। साथ में छोटकुओ गइले। कइसे घर-परिवार चलावल जाला, एह मामला में त सभ नवसिखुए रहे। महीना में जवन पइसा मिले, कुछ दिन चले फेरु खतम हो जाइ। एही अभाव का उतार-चढ़ाव में दिन बीते लागल। घरो-परिवार के जिमदारी बढ़े लागल। जहाँ रहसु ओहिजा के त खरचा रहबे कइल, गाँवो त भेजे के रहत रहे। जेतना मिलत रहे ओहसे का होइत ? गाँव-घर में एगो होला नू कि मेहरारुन के कवनो चिंता-फिकिर ना होखे कि घर कइसे चली, ऊ त ई कहिके आपन पीछा छोड़ा लेली लोग कि हमनीका का जानीं जा, ई मरदाना लोग बूझसु कि कहाँ से आई आ कइसे होई। बाकिर ऊ त गाँव-घर का तिकड़म से अनजान अपना करतब के निरबाह करत रह गइली। कइसे का होई, कहाँ से आई, एही चिंता मे परल रहिहें। जब-जब गाँव जाए के होई बड़कू का अपना आफिस से लोन लेबेके परल। फेरु ऊ तनखाह से कटे शुरू हो जाई। अब ईहे समझ कि आमदनी अठन्नी आ खर्चा रुपइया। चचोजी बेमार रहे लगलीं। घर पर खर्च बढ़े लागल। उनुका साँच आ साफ बोलला का चलते परिवार के बाकी लोग उनुकाके मने-मने नापसंदो करी लोग। शुरू में त सभ ठीके रहे। उनुकर बाहर रहल सभके नीक ना लागत रहे। सभ ई जानत रहे कि सभका सहमतिये से ऊ बाहर रहतारी, उनुका खातिर परिवार पहिले बा आउर बाकी चीज बाद में। बड़कू हमेशा चिंता में परल रहिहें कि कहाँ से पइसा ले आईं...घरे कइसे जाईं। एगो-दूगो दोस्त-मित्र रहे लोग जेकरा किहाँ से हमेशा माङिके ले अइहें आ घरे भेजिहें। बीच में त एक बेर अइसन भइल कि गाँव प पइसा के बहुते जरूरत रहे। केकरा किहाँ जासु माङे खातिर, केहू बाँचल ना रहे। ओ घरी फोनो के अतना साधन ना रहे। उनुकर एगो मित्र बहुते संपन्न रहन। फोनो करे खातिर त पइसा चाहीं। कसहूँ पइसा के जोगाड़ कइके एसटीडी बूथ पर गइलन। बातचीत त ठीके भइल बाकिर जसहीं पइसा के बात कइले कि उनुका सुनाइले बन्न हो गइल। हलो-हलो कहे शुरू क दिहले उनुकर दोस्त आ सुनाते नइखे कहिके फोन काट दिहले।” 
भउजाई के आँखि लोरा गइल। भारी मन से बात आगे बढ़वली- 
बड़ा दुखी मन से घरे अइले। बड़की भउजी से बड़कू के उदासी ना सहाइ। ऊ हिम्मत ना टूटे दिहली उनुकर- “जाए दीं, कवनो बात नइखे। अउरुओ दोस्त लोग त बा। एक जगहा ना मिलल त का भइल, दोसरा किहाँ मिल जाई।” बड़कू फेरु अपना एगो दोस्त किहाँ गइले हालाकि पहिलहूँ से उनुका से पइसा लीहल रहे। जरूरत बा त माङही के नु परी। दोस्त का घरे पहुँचला पर बहुत देर तक बइठल एने-ओने के बतकही शुरू रहे बाकिर पइसा माङे के हिम्मत ना जुटा पावत रहन। अभी कुछ कहितन ओकरा पहिलहीं जवन बतकही चलत रहे ओही में उनुकर दोस्त कहि दिहले कि कुछ लोग कर्जखोर होला। आदत परि जाला कर्ज लेबे के। ई बात उनुका बहुत लागल। ए बबुनी, एक त केहूँ के दुआरी केहूँ कुछो माङे जाला, ऊ असहीं गिरल रहेला ऊपर से अइसन बात सुन के ओकरा पर का बीती तू सोच सकतारू। बिना कुछ बोलले बड़कू चुपचाप घरे चल अइले। बड़की भउजी देखते समझ गइली। कहली कि चिंता जनि करीं। हमार जवन गहना बा ओकरा के बेच दीं। ओकरा से करजो भरा जाई आ कुछ टेंशनो कम हो जाई। बड़कू त हिचकिचात रहन बाकिर दोसर कवनो ऊपाइओ ना रहे। ऊ बूझि गइली। कहली कि का सोचतानी ? गहना काहें खातिर होला, मोका पर कामे आवे खातिर नू ! हमरा एकरा से कवनो मोह नइखे। हमार त गहना रउँए बानी। परले नु बा। 
ए बबुनी, गहना बेच के करजा भराइल। ई बतिया सभे जानेला। ओ घरी त चचो जी रहलीं। अब बताईं, कइसे केहूँ कहि दिही कि ऊ लोग घर-परिवार के ना देखल आ ना देखता। कमली के ना रहाइल, पूछि दिहलस- “ए भउजी तहरा अतना सभ कइसे पता बा ?” 
एगो संजोगे कहि सकतारू एहके। बड़को एक हाली आइल रहली त गइलीं उनुका से भेंट करे। ओ घरी ऊ नहाये जात रही। कहली कि रउआँ बइठीं, हम नहाके आवतानी। उनुका डायरी लिखे के आदत रहे। हम उनुका घरहीं बइठल रह गइलीं। संजोग से ओहिजे डयरिया रखल रहे। दोसरा के डायरी त ना पढ़ेके चाहीं बाकिर हमरा ना रहाइल आ उठाके पढ़े लगलीं। जइसहीं उनुका आवे के आहट मिलल, गँवे रख दिहलीं। जान जाईं कि हमार जिग्यासा अउरू बढ़ि गइल। जान-बूझि के अइसने समय पर जात रहीं कि उनुका नहाये जायेके होखे भा कवनो जरूरी काम करत होखस, जवना से उनुकर डयरिया पढ़े के मोका मिल जाव। कूल्हि बतिया थोड़े इयाद बा ? एक-एक गो इयाद कइला पर त एगो इतिहास लिखा जाई। ऊ त उनुका लोग के चर्चा कई देलू हा त अतना बात हो गइल। 
बड़ा समझौता कइली परिवार खातिर। बाकिर ओकर कवनो कीमत नइखे। बाप-मतारी के काम-किरिया सभ त बड़कुए कइले। घर-दुआर बनवला से लेके मझिलू के बियाह-शादी तक सभ कइले। सभ करजे काढ़िके होत रहे, अतना पइसा कहाँ धइल रहे ? खेतियो-बारी त ओतना नइखे कि ओकरा से कुछ होई। बड़को के एह बात के तकलीफ इचिको ना रहे कि ई खाली अपना घरे-परिवार खातिर करतारे। ऊ त खुशी से उनुकर साथ देत रही। बेचारी बहुत समझौता कइली परिवार खातिर अपना मान-सम्मान आ स्वाभिमान का सङे। जरूरत परला पर बड़कू का आफिस के चपरासी के मेहरारू से पइसा माङिके ले अइली कई बेर, जवना खातिर कई बेर उनुका अपमानो सहे के परल। जेकर एहसान रहेला, ओकराके त कुछ बोलियो नइखे सकत नु आदिमी। कई बेर त अइसनो समय आइल बा कि एक-एक गो चवन्नी-अठन्नी जोरिके घर के समान मङावे के परल बा। एक बेर त घर में ना त पइसे रहे आ ना समान। लइकन के हलुआ खाए के मन रहे। सूजी आ चीनी त रहे घर में बाकिर घीव आ तेल ना रहे। बिना घीवे के सूजी भूँजिके चीनी आ पानी डालिके बनाके लइकन के खिया दिहली। 
सभ कुछ सहन करत रहिहें बाकिर कबो केहूँ से कवनो शिकाइति ना। जानतानी ! कहाला नु कि हँसुआ के धार अपने तरफ खींचेला। बड़कुओ कबो-कबो खिसिअइहें त बड़ी कुठेठ बोल दीहें। सभ जानते रहिहें तबो कहि दीहें कि इनके चलते हमरा घर में सभ बिखराव भइल। एकरा पर जसहीं ऊ कुछो बोल दिहली त ऊ शुरू हो जइहें- “झगड़ा करबू ? झगड़ालू औरत ! कलह करत रही ई कलही औरत। घरे ना जइहें, घर परिवार से इनका नफरत बा।” ए पर ऊ कतना सुनसु ? कहि दीहें कि रउआँ कब कहलीं हा ? हम कहलीं हा कि हम ना जाइब ? रउआँ सभ जानतानी, तबो हमरे प सभ दोष लगा दींला। कुछ देर का बाद जब बड़कू के अपना गलती के एहसास होई त सोचिहें कि इनकर त कवनो दोष नइखे तबो हम इनके प खिसिआ जाईंला। ऊहो का करसु अतना पढ़-लिखके अइसने नोकरी मिलल। तू त जानते बाड़ू कि बड़कू के पढाई के जिला जवार मे शोर बा। घर के अइसन इस्थिती रहे कि एक बेर जवना नोकरी में घुस गइलन ओह में से निकले के संजोगे ना भइल। भाई लोग के कहिहें कि तहरा लोग के अतना जानकारी बा त तूहूँ लोग काहें नइखऽ कुछ करत। दूनो भाई मिलके दुआर पर टिउसनो पढइतऽ लोग त कुछ पइसा घरे आइत अउरू आराम से घर के काम चलित। जानतानीं ? ए पर ऊ लोग नराज हो गइल। सभ त ईहे नु कही कि बड़कू पइसा नइखन भेजत, एहीसे ए लोग के टिउसन पढ़ावे के परता। ए बबुनी एकरे के मिथ्या अभिमान कहल जाला। सभ करम हो जाव बाकिर केहूँ जाने मत पाओ। बड़कुओ का करसु ? घर-परिवार सभके जिमवारी त उनके ऊपर रहे आ ऊ आपन जिमवारी निभावे खातिर का-का ना कइले, बाकिर तबो सभ ईहे कहि देला कि तू का कइल। बीच-बीच में त अइसन तंगी के हालत भइल कि बड़कू चिंते में परल रहसु, बाकिर बड़की भउजी एने-ओने भा नइहर का लोग से भी करजा माङिके ले आके दे दीहें- “लीं घर प भेंज दीहीं।” अतना कइला का बादो उनका कवनो आदर-सम्मान ना मिलल परिवार में। 
बड़की भउजी के एह बात के बहुत तकलीफ रहेला कि हम त दोसरा घर के लइकी हईं, हम खराब हो सकतानी। हमरा के केहूँ मत आदर देउ, मत पूछो, बाकिर अपना भाई के त मान-सम्मान देबेके चाहीं। साँच त ई बा कि ओह घर में सभ केहूँ अपना मने से काम करेला। ओह घरी बड़कू से केहू ना कुछ पूछी बाकिर जब कहीं आवे-जाए के बात होखे भा नेवता-हँकारी के, चाहे घर-दुआर के, तब लोग कहिहें कि ऊ जानसु, घर के मालिक त ऊहे नु हवे, हमनीका का जानतानी जा। आपन सभ कुछ लुटाइयो के बड़कू के खाली बदनामिए मिलल। गाँव-जवार, हीत-नात- सगरी ईहे संदेश जाए कि हमनीका का करीं जा ? हमनीके पास बा का ? अउरू ना त अपना के साफ-सुथरा देखावे खातिर ईहो कहि दी लोग कि उनके मना कइला का चलते हमनीका तहरा लोग किहाँ ना गइल रहलीं जा। सभ त ईहे नु जानी कि ई ठीके कहता लोग आ एकरे के साँच मान के भीतरे-भीतर खिसिया के बइठल रही लोग। बड़कू के का मालुम कि उनुका बारे में अइसनो झूठ लोग बोल सकता। 
ए बुची, एक बेर त अइसन भइल कि बड़कू के बदली दोसरा जगे हो गइल। एहिजा ले जाए से पहिले जेकरा ले पइसा लेले रहन ओकर त देबहीं के नु परित। एकरा चलते ऑफिस से जवन एडवांस मिलेला ओकरा में अधिका ले लिहले जवना से एहिजो के पइसा दिया जाउ, आउर कुछ घरहूँ चल जाव। सभ त हो गइल बाकिर जब बिल बना के दीहें त जवन अधिका होई, तवन त कटबे नु करी ? अगिला महीना के तनखाह बहुते कम मिलल। सभ त कट गइल। अब का अपना पासे राखसु आ का घरे भेजसु। नाया जगहा पर केहूँ से माङहूँ में त सोचे के परी। तले घर से चिठ्ठी आ गइल कि हतना पइसा भेज द। जवन मिलल रहे, कुल्हि भेज देतन तबो पूरा ना होइत। ए बबुनी, ऊ करसु त का करसु ? अब गहनो पासे ना रहे बाकिर बड़की भउजी का लगे अभियो एगो अङुठी आ गोड़ के पायल बाँचल रहे। कहली कि एहिजा केकरा से मङाई। देखीं एकरा से कुछ मिल जाए त बेंच के काम क लीं। बगले मे एगो छोट बजार रहे बड़कू ले गइले बाकिर भीतर से एकदमे सहमल कि केहूँ देख मत लेउ। केहूँ देखी त का कही। अइसहीं ऊ छिप-छिपा के बेंचिके पइसा ले अइले। जवन पासे रहे, ओकरा में मेराके घरे भेज दिहले। अब रउँए बताईं कि के करता परिवार खातिर अतना ? अतना बदनाम भइलो पर अभियो करे खातिर हमेशा तेयार रहेले। 
का ना कइले ? छोटकुओ के बाहर रखले चार-पाँच साल। रहे से लेके खाए-पीए तक के सभ खरचा दिहले। तबो ऊ खिझले रहसु। बिना कुछ बड़कू के बतवले घरे आ के बइठ गइले। ना कवनो फोन ना कवनो बात-बिचार। बिना केहूँ के रहले बहुत दिन भाड़ा दिआत रहल। ई लोग का कब सोचता आ कब का करी लोग, ई ईहे लोग जान सकता, दोसर केहूँ ना। आदर्श आ सिद्धांत के बात खूब करेला लोग बाकिर सभ दोसरे के सुनावे खातिर। अपना बेर कवनो सिद्धांत ना होला। ठीक बा, बड़ भाई-भउजाई खराब बा लोग, ऊ लोग केहूँ के नइखे पूछत बाकिर तू लोग त सही बाड़ऽ। चार दिन खातिर ऊ लोग आवता त बढ़िया से आदर-भाव करित लोग ईहे सोच के कि चार-पांच दिन में चलिए जाई लोग। बाकिर काहें के ? बड़ भाई-भउजाई खातिर उनुका लोग के मन मे इज्जत आ आदर नइखे। कई बेर त बड़कू आइल बाड़े दुआर पर बाकिर दूनो भाई घरही में रहे लोग आ सुनके बहरी ना निकलल लोग। ई ना कि अतना दिन पर भइया आइल बाड़े त खुशी से दउरि के जाईं आ भाई से मिलीं। एक जाना हेने गइले, एक जाना होने। लइका-फइका अइले सन। बाद में अइला पर बड़कुए बातचीत शुरू करिहें। अब बताईं, ई कुल्हि आदमी जब आदर्श झारी त लोग हसँबे नु करिहें। हँ, ऊहे बिश्वास करी जे एह लोगन के अतना करीब से नइखे जानत। 
ऊ लोग जब एहिजा ना रहे त तू लोग अपना मन से कहीं जात-आवत रहेल बाकिर बड़कू के रहलो पर पूरा परिवार नइहर चलि गइल। ओ घरी ना पूछल लोग कि तहरो जाएके बा भा तू जइब चाहे का नेवता जाई। ओ घरी बड़ भाई ना रहिहें। बाकिर जब बड़कू कहिहें कि हमरा छुट्टी नइखे, फलाना जगे तू लोग चल जइह त ओहिजा ना जाई लोग। अरे हितई सभकर एके नु बा ? 
ए भउजी, आ मझिलो भउजी कुछ ना कहसु ? 
ऊहे नीमन रहिती त का दुख रहल हा। ऊ त आजु तक कबो बुझबे ना कइली कि हमरा जेठ आ जेठानियो बा लोग। उनुका पर कबो रोक-टोक ना रहे। जब मन करी, नइहर चल जइहें, बजार-हाट कहीं चल जइहें। सभ रोक-टोक बड़किये भउजी खातिर बा। बेमारो माई-बाप के देखे चल गइली त काहें चल गइली। एहिजा नइखी आवत, ओहिजा चल गइली, जबकि चाचा जी का मरला का बादो जब तक चाचीजी जीयत रहली एहिजा आइए के ऊ अपना गाँवे जइहें, ऊहो चाचीजी से पूछिए के। उहाँके कहले पर जइहें। एक बेर मझिलू अचानके खूब बेमार हो गइले। बड़कू किहाँ खबर गइल। एके हफ्ता बाद उनकर सपरिवार गाँव आवे के टिकट कइल गइल रहे, बाकिर बेमारी के खबर सुनते बिना रिजर्वेशने के बइठिके अइले। आवते डाक्टर के देखवला से लेके दवा दारू तक सभ कइले। ओही में चाचियो जी बेमार हो गइली। सभके डाक्टर के देखा-सुना के ठीक क के चले के तैयार भइलन। ए बबुनी ईहो ना कइल लोग कि चार गो रोटियो बनाके दे दी राही में खाए खातिर। मझिलो भउजी के तनी सोचे के ना चाहीं कि जे आदमी हमरा मरद के बेमारी सुनके बिना रिजर्वेशने के आइल आ सभ खर्चा कइल, ओकरा खातिर हम अतनो नइखीं कर सकत कि रस्ता के खाना दे दीं। बड़कू राही में कुछ कीन के खा लिहले आ डेरा में पहुचँत-पहुचँत उनकर तबीयत बिगड़ि गइल। अतना ना दस्त शुरू हो गइल कि मत पूछीं। उनुका के पकड़िके उठावे-बइठावे के परे लागल। जेकरा अतना उल्टी-पैखाना होई, ऊ बिछावन से ऊठे लायक रही ? घरहीं डाक्टर के बोला के सूई-दवाई भइल। केहू ना कहे कि अइसन हालत में अतना दूर लेके जा लोग। बाकिर बड़कू कहले कि ना, गाँवे त जाहीं के परी काहेंकि माई से कहिके आइल बानी कि सभके लेके आवतनी। ऊ रास्ता ताकत होई। घरहूँ सभ जानत रहे आ ऊहो लोग कहल कि देखिह, तबीयत देखिए के चलिह। आ ओही टिकट पर ऊ लोग चल दिहल। अतना असानी से टिकटो त ना मिली। ओही हालत में ऊ लोग चल दिहल। अगिला दिन जब गाँवे पहुँचल लोग त ओकरा ठीक एक घंटा पहिले मझिलो अपना भाई के बोलाके नइहर चल गइली। इचिको ना सोचली कि अइसना हालत में ऊ लोग आवता त हमरा एहिजा रहे के चाहीं। तनिको लाज ना लागल कि हमरा अइसन कइला से केहूँ का सोची कि अइसना हालत में हम जातनी। 
ठीक बा, उनुका माया नइखे बाकिर तू लोग त आपन भाई हव लोग, तहन लोग के ना सोचेके चाहीं कि ई कतना गलत हो रहल बा। केहू ए प कुछ ना बोलल, अउरू ना एह बात के कवनो दुख कि हमार भाई अतना कष्ट में आ गइल बा आ हमनीका कतना गलत कइलीं हा जा उनका के नइहर भेजिके। ई काम जो बड़की भउजी कइले रहिती त घर में का से का हो जाइत। जिनिगी भर सुनाइत लोग। बाकिर मझिलो भउजी के केहूँ कुछो ना कही। दस दिन का बाद जसहीं बड़की भउजी अपना गाँवे गइली कि ओही दिन साझी खान आ गइली। उनुका रहला प ना अइली। जानतानी, बड़ी कहानी बा इनको। कुल्ही कहला पर एगो किताबिए लिखा जाई। 
बात करत-करत साँझि हो गइल। “ए बबुनी बइठ, तनी दीया-बाती बारिके आवतनी।” ओकरा बादो ओही कुल प चर्चा होत रहि गइल। रात के खाना-पीना भइल, ओकरा बाद सूतल लोग। भोरे उठहीं में देर हो गइल। अभी कमली सुतले रहे कि ऊ चाय बनाके ले अइली। 
ए बबुनी, ऊठीं, चाह ले आइल बानी। सेरा जाई, आँखि-मुँह धोईं, चाह पियल जाव। काहें बबुनी, राती खानी ठीक से नीनि ना भइल हा का ? 
ना ए भउजी, बड़ी देर का बाद नीनि लागलि हा। बड़का भइया आ बड़की भउजिए का बारे में सोचत रह गइलीं। आजु का जमाना में अइसनो भाई-भउजाई बा, जे अतना निभावता। 
हँ ए बबुनी, राति हमरो देरे से आँखि लागलि। हालाकि तहरा से बतिअवला का बाद हमरो मन हल्का हो गइल। ई बात हम केहूँ से आजु ले कहले ना रहलीं हा। हमरो नीनि देरिए से टूटलि हा। ऊ त बड़की बुचिया उठिके झाडू-पोंछा कइके तरकारी बनाके आ आटा सानिके ध देले बिया। कमली के नजर जब घड़ी पर परल त चउँकि गइलि- एगारह बजि गइल। बड़ा देर ले सुतल रहि गइलीं हा। लागता कि दुआर पर केहूँ बोलता। कमली उठिके चलि गइलि देखे कि के ह। ओने से आइल त ओकरा हाथ में एगो लिफाफा रहे। 
ए बबुनी के रहल हा ? डाँक बाबू रहले हा। कहँवा के चिठ्ठी ह ? ए भउजी, तहरे नाव से आइल बा, रजिस्ट्री हटे। खोल के देख ना केकर ह। कमली खोलके देखे लागलि। ए भउजी, ई त बड़की भउजी के ह। आँय, बड़की भउजी के ! का ह हो ? खोल ना। कमली लिफाफा खोलिके देखे लागलि। ई त तहरे नाम के चिठ्ठी बा। पढ़ ना, का लिखल बा। कमली पढ़े लागलि- 
“प्रणाम। रउआँके का कहिके संबोधित करीं, हमरा नइखे बुझात। के बड़ बा, के छोट, हमरा नइखे मालूम। बड़ी दिन हो गइल रउआँसे भेंट भइल। हम जानतनी कि रउआँ हमार डायरी पढ़त रहलीं हा। हम देख लेले रहीं पढ़त। बाकिर हम कबो बतवलीं ना कि हम जानतानी। जान-बूझि के चुप रहलीं, काहेंसे कि जवन हम केहूँ से ना कहलीं, ऊ रउआँ पढ़िके जान गइलीं। हमरो मन हल्का भइल कि केहूँ त बा, जेकरा ले हमार दर्द साझा भइल। अब त रउआँ से हमरा घर के कवनो बात छिपल नइखे। रउआँ त मालूमे बा कि घरे जब मन करी फोन उठाई लोग, ना मन करी त ना उठाई लोग। अइसनो हो जाला कि महीनो फोन ना उठाई लोग। राउर बड़कू हाल-चाल खातिर बेचैन हो जाले त दोसरा किहाँ फोन कइके पूछेले कि हमरा घरे सभ ठीक बा नू ? का करसु, मन ना मानेला। हम जल्दबाजी में चलि अइलीं, रउआँ से मिलहूँ के संजोग ना भइल। एकरो अभास बा हमरा कि रउआँ एह बात के तकलीफ जरूर होई कि हम पूरा डायरी ना पढ़ पवलीं। एहीसे डायरी के कुछ पन्ना जवन रउआँ ना पढ़ पवलीं, चिठ्ठी का सङे भेजतानी। अब तबीयतो ठीक नइखे रहत। का पता, फेरु भेंट होई कि ना। राउर कहानी अधूरा त ना रही। जो फेरु कबो भेंट हो गइल त डायरी के नाया पन्ना हम खुदे दे देबि पढ़े के। बाकिर सभ ऊपरवाला के महिमा। काल्हु का होई, के जानता। ईश्वर करसु रउआँ सभ असहीं बनल रहीं जा। उमेदि ना छोड़ेके चाहीं, बाकिर त होइहें सोइ जो राम रचि राखा।” 
कमली आ भउजी दूनो जानी सन्न रहि गइल लोग। ननद-भउजाई दूनो का आँखि से लोर थमे के नाँव ना लेत रहे। केहूँ का पासे जइसे कवनो शब्दे ना रहि गइल रहे बोले के। बस दूनो एक दोसरा के खाली मुँह ताकत रहे। 
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लेखक परिचय:-
नाम: सीमा मिश्र
बक्सर, बिहार 








मैना: वर्ष - 7 अंक - 118-119 (अप्रैल - सितम्बर 2020)

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