भरत के निहोरा - विद्या शंकर विद्यार्थी

भइया लवट चलऽ लोग हमरा के दोषी 
मानऽ भइया माई के हठ ना अफसोसी 

मंथरा के बात लेके उठेके उठ गइल माई 
ओकर बात हटावऽ हम त हईं छोट भाई 

हमरा से एतहत जिम्मेवारी ना निबही 
प्रजा दुखी होई कष्ट ऊ अनेरे काहे सही 

एह खराऊँ के भार भार अइसन नइखे 
जरूरत बा तोहार तोहार जइसन नइखे 

झिंटिका लड़ावे ओला गाँव में ढेर होले 
कतना घर डाढ़ देलन मने मने बिन बोले 

चलऽ भइया चलऽ सिंहासन खाली बा 
आइल लिआवे संग में हमरा माली बा 

बहुत हृदयी बाड़न सोच में खइलन ना 
कतना बाड़न कि चिंता में नेहइलन ना 

भरत से भूल सपनो में त भइल नइखे 
नीयतो कतहीं से देखे में मइल नइखे 

अँगुरी केहूके उठे मत भइया ई सोचऽ
हईं हृदय के साफ हो भइया ई सोचऽ

घाव के दर्द का होला मालुम बा तोहरा 
कौन बात के बा अभाव मालुम बा तोहरा 

चलऽ भइया छोट हईं हम छोटे रहब 
अलग ना सपनो में हम एक गोटे रहब। 
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लेखक परिचयः
C/o डॉ नंद किशोर तिवारी
निराला साहित्य मंदिर बिजली शहीद
सासाराम जिला रोहतास ( सासाराम )
बिहार - 221115
मो 0 न 0 7488674912

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