बनचीरी - दिनेश पाण्डेय

ए बनचीरी, ए बनचीरी! 
कवन दिसा से अइलू पुतरी?
कवन घिरनियाँ, कथि के सुतरी?

कवन रचावल मंच अनोखा, 
कवन लिखल अनबुझ तहरीरी?
ए बनचीरी, ए बनचीरी! 

केकर अँगुरी डोर लपेटल? 
कवन नटुअवा बाग समेटल?
खेलत डुमकच कवन छबीली, 
आँक रहल सभकर तकदीरी?
ए बनचीरी, ए बनचीरी? 

तिनुका जोरत, खोता सेवत,
दरस-परस, दृग पोंछत-भेंवत, 
हिय के ताप मिटावलि धिअई
चुगत चोंच कीरी-पनजीरी।
ए बनचीरी, ए बनचीरी!

पाँखि झरल पाँजर बल छीजल,
कइसन देह बिधाता गींजल?
मंद परल आसते सकल सुर, 
जिनिगी भरि के तानारीरी।
ए बनचीरी, ए बनचीरी! 

पाँखि पसारे थकन बिसारे,
बोझिल अँखियाँ राह निहारे।
कहीं तान में तुलसी चउरे,
बारल केहू दीप अखीरी।
ए बनचीरी, बनचीरी!
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लेखक परिचय:-
नाम - दिनेश पाण्डेय
जन्म तिथि - १५.१०.१९६२
शिक्षा - स्नातकोत्तर
संप्रति - बिहार सचिवालय सेवा
पता - आ. सं. १००/४००, रोड नं. २, राजवंशीनगर, पटना, ८०००२३

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