अजबे भइल बा भाव - देवेन्द्र कुमार राय

आजु हमरे शहर हमरा से अन्जान लागता
जमनी जवना अंगनवा अब उहे मशान लागता
पीपरा के पात जस कांपता मन का हम कहीं
लोभ में लसराइल आजु सभके परान लागता।

नीत राजनीति सभ बालु के भीत भइल
सभे लालच के लार के मशीन लागता,
आस बिसवास खास केहू के ना पास
अपने घरवा ई अपने में हीन लागता।

खासे में खास केहू खासमखास लउकता
आजु उहो दुनिया में बड़का दीन लागता,
धोखा के सोखा अनोखा ई दुनिया बा
छल के जे मोटका बा उहे मेहीन लागता।

अजबे भइल भाव ना लउकता नीक ठांव
सगरो आन्हार भकसावन डहर लगता,
अपने जमलो प अब ना बिसवास बांचल बा
देखि दुनिया के रीत अब अपने से ड़र लागता।
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लेखक परिचयः
जमुआँव, पीरो, भोजपुर, बिहार

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