दूल्हा ना किनाई - तारकेश्वर राय 'तारक'

एके तरह पलल बाबू, पढ़वल एके पढाई
भेद भाव नाइ कइल, दिदिया सबके समझाई।

अपने त पढलस दिदिया, दुसरो के पढ़ाई
दिदिया के दूल्हा, अब ना किनाई।

दिदिया के कहना बा, सुनले ए माई
रहब कुँवार भले ही, दहेज ना दिआई।

ना बेचाइ खेत बारी, न गहना किनाई
होइ बात ओकरे से, जे बात मान जाई।

समाज में नर बाने ढेर, आ मादा बाली कम
तब काहे चाहता, दहेज भारी भरकम।

समाज के बीमारी ह, समाजे मेटाई
मँगब दहेज त, पतोह ना भेटाई।

पढ़, लिख तू , बनल समझदार
असरा बा तोहसे, उठाव कदम असरदार।

ठान ले ब मन में, त तोहके केहू न डिगाई
बियाह में हमरा, दहेज लिआइ न दिआई।

पढ़ल लिखल क, बानगी देखाव
ना चाही भीख, इ सबके बताव।

भार्या त मिलबे करी, आसीस मिली सास से
तोहरा ओर देखता, समाज बड़ा आस से।
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लेखक परिचय:-
सम्प्रति: उप सम्पादक - सिरिजन (भोजपुरी) तिमाही ई-पत्रिका
गुरुग्राम: हरियाणा

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