कठ मउग - दिलीप कुमार पाण्डेय

संदेस परीक्षा खत्म भइला का बाद अपना चाचा का लगे गइलें। गांव के रहल लइका खेत-बधार टोला-परोसा में घूमे के आदत चाचा का काम में जाते बेचारू घर में बइठल अगुता जास।एक दिन आपन तकलीफ चाचा से कहलें। चाचा भतीजा के परेसानी दूर करेला अपना संघतिया असोक से संदेस के जान-पहचान करा देलें आ उनसे कहलें जे हमरा काम में चल गइला का बाद इनकर घर में मन लागत नइखे त कबो काल्ह तहरा लगे आ जइहें। असोक के एगो दोकान रहे। आ उनकर घरो ओजा से कवनो बेसी दूर ना रहे ।संदेस असोक के चाचा कहे लगलें आ उनका मेहरारू के चाची। जान पहचान भइला का बाद असोक का घरे आना जाना सुरू हो गइल।संदेस का डेरा से सय डेग गइला का बाद मोड़ आवे आ मोड़ से दहिने हो कुछ दूर गइला बाद बायें ओर जवन पहिला गली आवे ओही में लगभग दू सऽ डेग बढ़ला पर असोक के घर रहे।

संदेस रूप रंग आ कद काठी के बनइता रहस। जेने चलस ओने लूकाइयो के लोग एक नजर देख लेवे। अपना घर से निकल जब संदेस असोक का गली में घुसस त् एगो घर का बरंडा में खड़ा लइकी इनका-के देख मुस्काए। ई बेचारू भल लइका नजर नीचा क जेङ मरखाह माट साहेब से बिद्यार्थी नजर ना मिलावे ठीक अउसहीं आगा बढ़ जास। उनका आगा बढ़ते उ लइकी तनी जोड़े से केवाड़ी बंद क देवे। ओकर कोसिस इनकर धियान अपना ओरी खींचल रहे। अइसन खेला चार पांच दिन चलल। बेचारू संदेस बाघ का मुंह से निकलला जस ओह घर के पार कइला प महसूस करस।

ओह लइकी के आना-जाना असोको का घरे रहे। उ असोक का मेहरारू जेकरा के भउजी कहत रहे से संदेस का रूप-रंग आ गंभीरता के प्रसंसा कर उनका बारे में सब जानकारी ले लिहलस। संदेस के गांवे खातिर टिकट बन गइल रहे। उ असोक का घरे जा-के कहलें "चाची आउर हम चार दिन बानी सनिचर के चल जाएम। रउओ कबो गांवे जाए-के होई त् हमनी का घरे जरूर आएम।"

"ठीक बा अबकी बेर गइला पर रउओ घरे जरूर जाएम।" अतना कह उ चाय बनावे चल गइली।

एने उ लइकी केवाड़ी लगे सट सब सुनत रहे। उनका हटते संदेस के हाथ ध-के लागल कहे "तू कइसन आदमी बारऽ, हरदम तहरे राह निहारत रहेनी, तहरा के देखते हमरा मन का कतना आनंद मिलेला उ कह नइखीं सकत। सायद ओतना आनंद चांद के देख चकोर का ना मिलत होई। हम ई जीवन तहरे नाम क देले बानी। हम तहरा बीन रह नइखीं सकत। तहरा प्यार में अतना डुब गइल बानी जे सुतत जागत, उठत बइठत हर घड़ी, हर जगह बस तहरे चेहरा नजर आवऽता। लोक-लाज सब छोड़ हम तहरा संगे जीवन बीतावेला तइयार बानी। हमरा के,अपना लऽ।"

ई सब सुन संदेस के ठकुआ मार देहलस। जब होस आइल त हाथ झटक-के छोड़वले आ कहलें देखऽ प्यार कवनो खराब चीज़ ना हऽ। बाकिर एकरो एगो दायरा बा ।हर घर हर परिवार के मान मरजादा बा ।हम एगो अइसन परिवार आ समाज के अंग हईं।

जहाँ अमर्यादित कारज निषेध बा। अपना मन पर काबू करऽ, घबरा जन तहरा भाग में जे होई उ जरूर मिल जाई।

लइकी नाक चढ़ा आ मुंह अइंठ के कहलस "तें कठ मउगा हवस का रे?"
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लेखक परिचय:-
बेवसाय: विज्ञान शिक्षक
पता: सैखोवाघाट, तिनसुकिया, असम
मूल निवासी -अगौथर, मढौडा ,सारण।
मो नं: 9707096238

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