नूरैन अंसारी के तीन गो कविता

मन में नेह-छोह रहे दी!

अपना भाषा, अपना माटी के हिरोह रहे दी!
केतनो बदलीं बाकिर मन में नेह-छोह रहे दी!

खूब लड़ी रवुआ, धरम के नाम पे लड़ाई,
बाकिर मनवता के प्रति तनी मोह रहे दी!

शहर में आके मत बदली घर के संस्कार के,
सास के सास आ पतोह के पतोह रहे दी!

बेटहा बन के मत उजाड़ी बेटिहा के पलानी,
गरीब आदमी के हाथ में भी, नोह रहे दी!

"नूरैन" मत डरीं तनको भी भुईया-भूपाल से,
गलत गलत ह ,मन में सदा बिद्रोह रहे दीं! 
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रमजान 

हर साल में महज एक बार आवेला रमजान!
संगे सनेश भाईचारा के ले आवेला रमजान!

मिटावेला इ ह्रदय से सगरी क्रोध-किना-कपट के,
जिनगी सादगी से जिए के सिखावेला रमजान!

बरखा हरदम पुण्य के होला ये पवित्र महिना में,
सुख-समृधि के सबके घर भेजवावेला रमजान!

झूम उठे ली धरती मईया,रोजदारन के इबादत से,
ईश्वर के चौखट तक सबकर दुआ पहूंचावेला रमजान!

इयाद दिलावेला हमनी के भूख से लाचार लोगन के,
उ सब के दर्द के अपना भाषा में समझावेला रमजान!
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डाह बा

जेने देखीं वोने,बस जलन बा डाह बा!!
गावं समाज के, इ घाव गहिराह बा!!

आपन त चलत बा, कौनो लाखन खींच-खाँच के, 
बाकिर दोसरा के चक्क्रर में लोग तबाह बा!!

कोहर के बोली त ,लोग के लागेला निक, 
आ खुल के हंस दिहल, बड़का गुनाह बा!!

साँच के चिरुआ भर, पानी बा दुर्लभ,
आ झूठ के घरे देखीं, धन अथाह बा!!

सोझबक के घर बाहर केहू ना पूछेला, 
आ लंगा के चारू ओर खूबे बाह बाह बा!!

जले चलत बा जांगड़ सब लोग हित-नात बा, 
आ थकला पर नाही कही, कौनो पनाह बा!! 

मुंह मारी राउर, बड़का कोठा अमारी के, 
एहिमे केतना ग़रीबवन के तड़प बा आह बा!! 

बरतिया का जानी,उबरल खाना के मरम, 
पूँछी ओकरा से, जेकरा घरे बियाह बा!! 

देखावा में जिनगी के दशा भईल अईसन,
की मीठा बा सेर भर आ बड़का कड़ाह बा!! 

"नूरैन" जले चलत बा एक में,घर चलावत रहीं,
अलगा भईला में भाई हो सबकर मुवाह बा!! 
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लेखक परिचय:-
नोएडा स्थित सॉफ्टवेयर कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर
मूल निवास :ग्राम: नवका सेमरा
पोस्ट: सेमरा बाजार
जिला : गोपालगंज (बिहार)
सम्पर्क नम्बर: 9911176564



मैना: वर्ष - 7 अंक - 117 (जनवरी - मार्च 2020)

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