पढ़ाई के मरम - डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

आरा शहर। कड़ाका गर्मी आ घाम। लूक आ आन्ही का चलते बाताबरन धूरि में रङाइल लागता आ धरती तावा अस तइ गइल बाड़ी। एही में बी.एस.सी. के प्रायोगिक परीक्षा समाप्त भइल ठीक डेढ़ बजे। नारायन अपना चारो साथी का सङे परीक्षा देइ के निकलले। बाताबरन मन लाएक ना होखे त ओह घरी हँसिए-मजाक से मन के विश्राम मिलेला। सभ लोग आपन-आपन बतावसु कि हमरा के हई प्राक्टिकल मिलल हा आ हमरा के हई, बाकिर नारायन चुप। 

पूछ्ल लोग कि तू काहें नइख‍ऽ आपन बनावत नारायन ? नारायन कहले- “अनेर बतबँवरि में हम का फँसे जाईं। मारत बिया मुहे पर हवा। धूरि आ गर्दा से आँखि-मुह भरि जाता, एहमें प्राक्टिकल के बात सुनवला से का फायदा बा ? जवन भइल तवन भइल। “उनुकर गंभीर बोली आ नीरस चुप्पी सभका नीक ना लागल। कहल लोग जे हँसिए मजाक करत चलीं जा कि राहि कटो, एह कड़ेर घाम में चलल त अइसहीं आफति भइल बा।

तब तक नारायन देखले कि एगो बूढ़ि मेहरारू का सङे एगो जवान लइकी चलल आवति रहे पीछा से। इशारा से ई बात ऊ सभके जना दिहले। अब एह लोगन के एगो अच्छा-खासा विषय भेंटा गइल हँसी-मजाक के। सभ केहू एक दोसरा के ओह लइकी के भाई बताइ-बताइ, मजाक कइ-कइ अपना मन के थकइनी दूर कइल।

गँवे-गँवे चलला का कारन एह लोगन के भेंट हो गइल ओह बुढ़िया से। नारायन असमंजस में परल रहले जे बूढ़ी का सङे ई जवान लइकी कहाँ चलल जा रहल बिया एह मधि दुपहरिया में। उनुका मन में अतना जिग्यासा भइल कि आखिर पूछि दिहले बूढ़ी से- “ए मइया, एह घाम में रउँआ सभ कहाँ जाइबि जा ? बूढ़ी रोवे लगली- “का करीं ए बाचा लोग ? ईहे एगो लइकी बिया। कबो हँसतिया, कबो रोवे लागतिया आ कबो पगलाइ उठतिया। हमरा बुझाते नइखे जे कवन मुहफुँकनी स‍ऽ का करा देले बाड़ी सन एकरा ऊपर। सूने में आइल हा जे आरा के पीर बाबा किहाँ गइला पर ई सभ ठीक हो जाला। एही से उनुके किहाँ गइल चाहतानी जा। कइसहूँ ठीक हो जाउ हमरा बुची के रोग ! हे भगवान !” ईहे कहत अउरी रोवे लगली।

“ए बबुआ, तनी हमरा के बता देब‍ऽ कि पीर बाबा के राहि कवन जाई ?”- बूढ़ी चुपात पुछली। 

“हमनियो के ओही ओरी चलेके बा। चलीं, राहि देखा देबि जा।“ नारायन बतवले।

बूढ़ी चुप हो गइली। एने नारायन के साथी लोग ओह लइकी के एकटक निहारत रहले। निर्दोष भरल जवानी आ पुरहर सुनराई के धनी ऊ लइकी अपना मस्ती में रहे, देखला प मन करे कि देखते रहल जाव। नारायन जी ओह लइकी के देखले। फेरु से निहारि लिहलन जइसे ऊ पहिले सपना देखले होखसु। मन में सोचलन- “हे भगवान, तू हू का-का रचेल‍ऽ। हँसाइ के रोवावे लागेल‍ऽ। हइसन सुंदर देंहि देइके ओहके माटी में मिला दिहल चाहतार‍ऽ ?”

तब तक उनुका याद परल जे ईहन लोग का त पीर बाबा किहाँ नु जाएके बा। उनुकर आँखि खीसी लाल हो गइली सन एह अंधविश्वासी समाज का प्रति। ई प्राकृतिक नियम हटे। जे तनी पढ़ि-लिखि जाला, ओकरा ई कुल्हि चीज अंधविश्वास बुझाए लागेला। ऊ सोचे लगलन- “जो ईहे स्थिति रहि गइल त अपना देश के बरबाद होखे से केहू ना बचा सके। पइसा कमाए आ अपना काम वासना का पूर्ति बदे जगहे-जगह कहीं बरम्ह बाबा त कहीं पीर बाबा परगट होखे लागता लोग। अइसन लागता कि भारतीय संस्कृति पछिमो से बदतर हो जाई। राम-राम ! ई कतना खराब बा ! आ ओहू से खराब त ई बा जे काहें लोग ओह अंधविश्वास में फँसि जातरे। तनी ईहो त सोचेके चाहीं कि ई सभ साँच हटे कि झूठ। मरद कवनो काम करेलन त दस बेरि सोचि-बिचारिके, ठोक-ठठाके बाकिर इहाँ सभ बड़ी जल्दी भावुक हो जाईंले आ एही से झाड़-फूँक में जल्दिए बिशवास कइ लिहींले।”

अतना सोचते रहलन नारायन कि उनुकर ध्यान भंग हो गइल। बूढ़ी नारायन के ढकेलत ठुसुकली- “उँघात बाड़‍ऽ का ए बबुआ ?” 

“ना जी।“ चिहाइके सम्हरत ऊ बोलले- “एगो बात सोचत चलत आवत रहलीं हा।” 

“कवन बात रहलि हा ए बबुआ ?” बूढ़ी जानेके चहली। 

“कुछू ना, ऊ दोसर बात रहे।“ नारायन बात आन्ही में उधियवले। 

“जाए द ए बबुआ, हमरा का बुझाई पढ़निहारन के बात। हम त निपढ़ हईं, लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर।“ बूढ़ी महटियवली।

अबहिंयो ले नारायन के सोचल बन्न ना भइल रहे। उनुका ले रहाइल ना आ पूछि दिहले- “ए मइया, एगो बात बताइबि, जो पूछबि त ?” 

“काहें ना ए बबुआ ?” बूढ़ी के रुचि बढ़ल।

“बहिनजी के गवना अभी भइल बा कि ना ?” ओह लइकी का ओरि इशारा करत ऊ बात आगे बढ़वले।

“अबहीं ले ना ए बबुआ। इनका ससुरारि के त बहुत जोर रहे बाकिर हमनी किहाँ कबो बियाहे लइकिनि के नइखे भेजल गइल। एहसे तिसरका साले इनकर गवना कइ देबि।” बूढ़ी बतवली।

नारायन के दिमाग के एगो झटका लागल- “ई पोथियो पतरा बहुत ब‍ऽड़ काँट बा सुन्नर भविष्य का राहि में। एकरा पाछा-पाछा जे चली ऊ उफरिए नु परी। आ ई समाज के नियमे कम खराब बा ? गवना जब कइल जाई त खूब झाँपी साजि के, ना त दिन बढ़त रही। ई जो केहू के ना रहल तब ऊ आपन सेआन बेटी घर में राखिके ओकर जिनिगी खराब करो आ पाप के भागी बनो अलगा से। सोचते-सोचते तमतमा उठले नारायन- 

“ई कइसन सामाजिक बंधन हटे ? एह देखावा के परंपरा के तूरेके परी। समाज में गरीबो रहेले। तिलक, दहेज, नेवता, परोजन- ई कुल्हि मउवति बा गरीबन के। कतना लोग सुंदर जिनिगी का लोभ में अपना के बरबादी का गड़हा में ढकेल देले। आखिर एकर दोष केकरा के दिहल जाव।”

ओही मुद्रा में नारायन समुझावे लगले बूढ़ी के- “ए मइया, एह पीर बाबा आ बरम्ह बाबा के हमनीका नीके जानींले जा। रउँआ लइकी के सुधरे बदे एगहीं उपाइ बा। रउरा करबि त हम बता सकींला।”

“कह‍ऽ बाचा कह‍ऽ। “बूढ़ी गाल प हाथ धरत कहली।” नारायन शुरू कइले आपन कथ-

“देखीं, बरम्ह-भूत, पीर-मजार, टोना-ओझइती- ई सभ बेकार के बतकही हटे। जे मानेला ओकरा के माने दीं। एह से रउँआ कुछो फायदा ना होई। रउँआ चुपचाप अपना लइकी के घरे लेके जाईं। जो फेरु गवना के दिन ना आवे त अपने कहाव भेजाके पेठा देबि। एही से रउँआ लइकी के जिनिगी बनी।” 

अतना कहिके नारायन ओह लइकी का ओर तकले। ऊ मुसुकात आ खुशी में झूमत रहे उनुकर बात सुनिके। अब बूढ़ी के मुह खुलल आ फटाफट फूहर गारी के रोड़ा-पत्थर बरिसे लागल नारायन पर-

“देख‍ऽ हे मुहझउँसा के ! कह‍ऽता जे कहाव देके गवना करा दिह‍ऽ। तनिको सहूर बा एकरा ? हमीं मिललीं हा एकरा मजाक करे के ? तोरा माई-बहिन नइखे रे ?....”

नारायन के सँघतिया लोग उनुकर पीठि खुदुकाइ-खुदुकाइ के उनुका के अगाह करे लगलन- “चल‍ऽ एहिजा से आ तनी तेजिये में, ना त हमनी के बाँचलो-खूचल ईजति माटी में मिलि जाई। तोहरा सङे रहला पर ईहे हाल होई हमनी के।” ओमें एगो दोस्त जोड़लस- 

“ई उमिरि मउज-मस्ती के हटे, ग्यान छाँटे के ना।”

नारायन बूझि गइले जे बूढ़ी मइया अब मानेवाली नइखी। ऊ बूढ़ी का जरी जाइके अङुरी से देखाइके कहले- “देख‍ऽ मइया, हउहे कलक्टर साहब के डेरा हटे। ओहिजे जइबू त पीर बाबा दुरिए ले लउकि जइहें। अब खूब गारी देत रह‍ऽ, हमनी का जात बानी जा।” 

अपना सँघतिया लोग का सङे नारायन दोसर राहि पकड़िके चलि त दिहले बाकिर उनुका मन में एगो सवाल बार-बार उठत रहि गइल कि साँचो कहला पर जो केहू मानेके तेआर ना होखे त आखिर का उपाइ बा ओहके मनावे के। कुछ देर सोचला का बाद उनुका बुझा गइल कि निपढ़ रहला का कारन एह तरह के समस्या के जनम होला। पढ़ाई के मरम बुझा गइल रहे उनुका। अब ऊ खाली विद्यार्थी ना रहि गइल रहन। उनुकर चेहरा देखिके लागत रहे जइसे ऊ कुछ ठानि लेले बाड़े। साइति पढ़ावे के, साइति सभके पढ़ावे के। 
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लेखक परिचय:-
जन्म: बड़कागाँव, सबल पट्टी, थाना- सिमरी
बक्सर-802118, बिहार
जनम दिन: 28 फरवरी, 1962
पिता: आचार्य पं. काशीनाथ मिश्र
संप्रति: केंद्र सरकार का एगो स्वायत्तशासी संस्थान में।
संपादन: संसृति
रचना: ‘कौन सा उपहार दूँ प्रिय’ अउरी ‘फगुआ के पहरा’
ई-मेल: rmishravimal@gmail.com

मैना: वर्ष - 7 अंक - 117 (जनवरी - मार्च 2020)
[पांडेय नर्मदेश्वर सहाय द्वारा संपादित “अँजोर”(79-80) में “परंपरा के कारिख” शीर्षक से पूर्वप्रकाशित। अब संशोधित रूप।]

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