जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के आठ गो कविता

पोसलें अब कुछो पोसाता 

बूढ़वन के सुखले दियाता 
कहवाँ बा उजियार फलाने। 
रोवें पुक्का फार फलाने॥ 

कबों उनुका रहे फ़फाइल 
सीमा लाँघते उड़स आइल 
सोचीं सै सै बार फलाने। 
रोवें पुक्का फार फलाने॥ 

दादी से लत्ता उठववले 
घरे उ लुग्गा फइलवले 
बउवाइल बेजार फलाने। 
रोवें पुक्का फार फलाने॥ 

बहुरिया के नजरी जोहस 
रोजे जाई पछुवा पोवस 
परापत से लचार फलाने। 
रोवें पुक्का फार फलाने॥ 

हुक्का पानी रिस्ता बिगरल 
सगरी सिरजन बाटे उजरल 
कत्तों बा गुलजार फलाने। 
रोवें पुक्का फार फलाने॥ 
----------------------------

मरिचाई 

मरिचाई लागेले 
छुवला पर कबों-कबों 
बेछुवलो लागि जाले 
बेछुवल लागल मरिचाई 
ढेर दिन ले छछराले 
का जानि काहें 
ई लगियो जाले 
कुछ लोगन के। 

बुझाये लागेला 
दोसरो के
बाकि जेकरा साँचो लागल रहेले 
उ कहियो ना पावेला 
आपन दरद आउर पीर 
ओकरा चीसत देखि 
ढेर लोग मुस्कियात रहेले 
कनखी मार के। 

भलही आपन लूर 
एकहु कउड़ी के ना होखे 
डींग हाके मे सभेले आगे 
अलगा जाये आ देखावे के फेरा मे 
निकलुवा अस हो जाला 
तबों घुमची अस अपना 
ललछौही निरेखत रहेला 
जरलकी करियई से निभोर होके। 

अपने गुरुरे आन्हरन के 
ढेर लागेले मरिचाई 
अब मरिचाई लागल बा 
त परपराइबो करी 
टीसबो करी 
फेर खजुली ना होखी 
त का होखी 
कुछ के इहे सुख बा। 
-------------------

जा इहवाँ से उफ्फर परि जा 

लउवा लाठी, चन्नन काठी चाट 
पोंछ के चिक्कन कइला 
कुल्हि पर बस लूट मचवलें 
चुरुवा भर पानी मे मरि जा॥ 

दिन मे करत छिनैती फिरलें 
जा इहवाँ से उफ्फर परि जा॥ 

रतिओ घुसी सेन्ह मे गवलें 
लाज न तोहरे तनिकों लागल 
गरही मे जाके तू गरि जा। 
जा इहवाँ से उफ्फर परि जा॥ 

केंकुरल मनई मंहगइया से 
लागत डर नवका भइया से 
तोर संघतिया चोर उचक्का 
झूठ के कर पहाड़ रइया से 
तहरे डंका बा सगरो बाजल 
दिन अछते देशवो चरि जा। 
जा इहवाँ से उफ्फर परि जा॥ 

जाहिल जब कुरसी पर पड़लें 
नीमनका पर खुदही अड़लें 
सभके लहचह , लमहर बाटे 
इजतियो पर खूंटी गड़लें 
आफत बीपत तहरे साजल 
सूखल पतई लेखा झरि जा। 
जा इहवाँ से उफ्फर परि जा॥ 

चारा कोइला टू जी थ्री जी 
कुछहू ना अब बाचल एजी 
चुवत पलानी टूटल खटिया 
हमरे ला असवासन भेजी॥ 
---------------------------

चलीं! बात करे के 

मिलजुल सबही के ज़ेबा टटोले के हर बेमारी मे, काम सरकारी मे 
देहरी मे घुसि के, जबरी बोले के बिलात विकेट से बिखरल पारी मे 
सुने जे ना केहु त धइके झकोले के बड़की आन्ही से उजरल बारी मे 
चेहरा न खिली , घात करे के, मुद्दा न मिली, उतपात करे के। 
चलीं! बात करे के॥ चलीं! बात करे के॥ 

फूटल थरिया मे पड़ल निवाला के मेला - ठेला मे घर के झमेला मे 
चोरो - घघोटो मे टूटल ताला के चउक – चौबारा पर बढ़त बवेला मे 
देखिके बदनाम कवनों शिवाला के लूट मचल बाटे कूल्हि तबेला मे 
आँखियो लाल, साथ साथ करे के ॥ दियरी के संगे जज़बात धरे के । 
चलीं! बात करे के॥ चलीं! बात करे के॥ 

बदरी-बुन्नी मे भसल ओसारी के गाहे बगाहे होत रसते के लफड़ा से 
चिन्हल-जानल मे गइल उधारी के रोज-रोज चलत धरम के झगड़ा से 
मँगनी मे उपरल कवनो बेमारी के दान मे मिलल मलमल के कपड़ा से 
टेम अछते, कुजात करे के। इजत तोपे क शुरुवात करे के । 
चलीं! बात करे के॥ चलीं! बात करे के॥ 

बोझा कपारे क केकरो धराई के 
टाइम बेटाइम भइल खराई के 
झगरा मे दोसरा के अनही अगराई के 
धूरी मे रसरी बलात बरे के। 
चलीं! बात करे के॥ 
--------------------------

कइसे काम चलइहें मालिक?

घरे - दुआरे सगरों शोर 
बनवा नाहीं नाचल मोर 
कइसे काम चलइहें मालिक॥ कइसे -----॥ 

हेरत हेरत हारल आँख 
केकर कहवाँ टूटल पांख 
सात पुहुत के बनल बेवस्था 
अब कइसे बतइहें मालिक॥ कइसे -----॥ 

बिन हरबा हथियार चलवले 
कूल्हि जनता के मन भवलें 
गाँव शहर के महल अटारी 
कूल्हि खोल देखइहें मालिक॥ कइसे ----॥ 

अकुताही मे भभकल दियरी 
छुटल उनुका उबटन पियरी 
गाँठ भइल बेकार अचानक 
केकरा से बतइहें मालिक॥ कइसे -------॥ 

नया नवेला बीरवा जामल 
रोज सबेरे लाइन लागल 
भरल तिजोरी कागज लेखा 
खुदही आग लगइहें मालिक॥ कइसे -------॥ 
---------------

कि बबुआ के जनम भइलें हो

अन्हिया मे उड़ल छन्हियाँ, बनल कहानियाँ
कि बबुआ के जनम भइलें हो॥

अरे हो घरे आइल आपन निसनिया
कि चनवा उतरि अइलें हो॥

काटे धउरे चाँन क चननिया, नाक के नथनिया
कि दुवरे के पलनिया हो॥

अरे हो करकेले कमर करधनिया
कि बबुआ स्रिंगार भइलें हो॥ 

सासू मोरी मटिया जगावेली,सभके बोलावेली,
जबरी जिमावेली हो॥

अरे हो हँसी-हँसी लोरिया सुनावेली
कि ललनवा दुलरावेली हो॥
---------------

गुजरिया लजा गइलीं हों

पह फटते किरीनिया दुलराइल
गुजरिया लजा गइलीं हों॥

छूटि गइलें घरवा
छुटल नइहरवा हो।
सइयाँ पर अपने मोहा गइलीं
रस बरिसा गइलीं हो॥

मइया के मिसरी अस बोलिया
भतीजवा के ठिठोलिया हो ।
सइयाँ पर अपने लुटा गइलीं
भोरही शरमा गइलीं हो॥

सुधिया के सुघर बिछवना
मइया क खेलवना हो।
बबुआ के आगु सभ भुला गइलीं
नेहिया लगा गइलीं हो॥

पह फटते किरीनिया दुलराइल
गुजरिया लजा गइलीं हों॥
----------------

धिया

देई-देई बोलावा
दुअरे बजना बजवावा
अँगने कोइली अस कुंहुकी
दुलारी धिया हो।

सासु गोतिन के जगवा
मिलजुल सोहर उठावा
ननदो तोहरे अस चंहकी
पियारी धिया हो।

बाबा पुतरी मे बसावा
खुल के मोहरा लुटावा
तोहरे बगिया मे मंहकी
नियारी धिया हो।

बिटिया होइहें सेयान
रखिहें सभकर धेयान
दुनहूँ कुलवा के सँवारी
सुकुवारी धिया हो।
--------------
लेखक परिचय:-
इंजीनियरिंग स्नातक;
व्यवसाय: कम्पुटर सर्विस सेवा
सी -39 , सेक्टर – 3;
चिरंजीव विहार , गाजियाबाद (उ. प्र.)
फोन : 9999614657
ईमेल: dwivedijp@outlook.com
मैना: वर्ष - 7 अंक - 117 (जनवरी - मार्च 2020)

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.