जनेव - राम प्रकाश तिवारी

जवना बने सिकिओ ना डोलसु बघवा ना गुजरेला।
तवना बने चले ले कवन बरुआ काटेले परास डंटा।
आहे तवना बने खोजे ले मिरिग छाल, कि आजु मोर जनेव हवन हो॥

आजो जब कहीं गांव जवार में रेडियो (लाउडस्पीकर) पर मेहरारु सन के समवेत स्वर में ई गीत सुने के मिलेला त। सुननिहार के दूरे से बुझा जाला कि ओह घरे कवनो लइका के जनेव हो रहल बा। जनेव जवना के उपनयन, यज्ञोपवित कहल जाला आ भोजपुरी क्षेत्र में बियाह के बराबर ही महत्वपूर्ण संस्कार मानल जाला। अइसे तऽ बियाह आ जनेव दुनु के कई गो बिधी एक जइसन होला बाकिर कुछ चीज एह में अलग होला। एगो विशेष बात ई बा कि वइसे त ब्राह्ममण, क्षत्रिय आ वैश्य तीनु वर्ण खातिर जनेव भा उपनयन के विधान बनल बा। बाकिर अपना भोजपुरी क्षेत्र में ब्राह्ममण आ क्षत्रिय में ई संस्कार विश्ष रुप से कइल जाला।

काँहे पहिरल जाला जनेव, आ का बाटे एकर वैज्ञानिक महत्व?

हिन्दू धर्म के 16 संस्कारन में से एगो संस्कार ‘उपनयन संस्कार’ होला। एही संस्कार के अंतर्गत जनेव पहिरल जाला। एह संस्कार के ‘यज्ञोपवीत संस्कार’ आ जनेव के ‘यज्ञोपवीत’ कह जाला। अइसे तऽ जनेव के कईगो आउरी नाम से भी जानल जाला जइसे – उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध, ब्रह्मसूत्र आदि। जनेव संस्कार (जनेव धारण) के परम्परा वैदिक काल से चलल आ रहल बा, एही के उपनयन संस्कारो कहाला।

‘उपनयन’ “उपनीयते गुरुसमीप प्राण्यते अनेनेति उपनयम” जेकर अर्थ होला कि उ संस्कार जवना से विद्यार्थी गुरु के लगे ले जाइल जाव। सीधा शब्दन में कहाव त एकर अर्थ होला ‘लगे (पास या सन्निकट) ले गइल।’ अब एजा प्रश्न उठेला कि केकरा लगे? – तऽ एकर उत्तर बा ब्रह्म माने ईश्वर अउरी ज्ञान के लगे ले गइल। पहिले के जुग में लइका जनेव भइला के बादे गुरु जी के आश्रम चाहे गुरुकुल में पढ़े खातिर भेजल जात रहसँ। शाएद इहे कारण बा कि एह संस्कार के उपनयन संस्कार कहल जाला। उपनयन संस्कार के बादे मनुष्य के द्विज मानल जाव। इहां द्विज से अर्थ दोसरका जन्म से लिहल गइल बा। काहे कि मनु के अनुसार, जनेव होखे से पहिले मुनष्य शुद्र होला (संस्कार कौतुम्प, पृ.370) आ शाएद एही से एह संस्कार में मुंडन आउर पवित्र जल में नहानो अहम होखेला। अपना ओर चइत बइसाखे में अधिकांशतः जनेव होखेला जवन मेहरारु लोग के एह गीत में भी देखे के मिलेला

चइत बरुआ तेजि चले बइसखि पहुँचले।
मोहि तोसे पूछिले एक बरुआ, केकरा घरे हो जइबऽ॥

हमार मानना ई बाकि चइत बइसाख के बेरा ले गृहस्थ के घरे अपना खेत के अनाज भी आ जाला परिवार के बाकी सदस्य लोगन के मूँजी-मेखड़ा खातिर मूँज, मृग छाला आ पलाश (परास) के डंटा आदि के इंतजाम में लाग जाले।

जवना बने सिकिओ ना डोलसु बघवा ना गुजरेला।
तवना बने चले ले कवन बरुआ काटेले परास डंडा ।
आहे तवना बने खोजे ले मिरिग छाल, कि आजु मोर जनेव हवन हो॥
कुँइया जगत पर मूँजहि केरा झुरवा, चिरेले कवन बाबा।
तहँवा कवन बरुआ अत नीधयइले,
अत छरिअइले दिही बाबा नवगुन जनेव॥

पहिले के जमाना में लोग बनारस (काशी जी) से वेदपाठी पंडित जेकरा के भोजपुरी में बेदुआ कहल जाला। आगे चलके शाएद जवना लइका के जनेव होखे वाला रही ओकरा के बेदुआ कहे के शुरु कर दिहल जवन अब बरुआ में बदल गइल बा। इहां धेयान देवेवाला बात ई बा कि बरुआ शबद ब्रह्मचारी के अपभ्रंश हऽ। आ इहो भी हो सकत बा कि एह बरुआ आ बेदुआ शबद के परियोग आ वेदपाठी आ ब्रह्मचारी के अपभ्रंश ऐसे बतावल गइल होखए कि लइका के मन में भी पवितत्रता के भावना पैदा होखे आ उ वेदपाठी बने के तइयार होखे।

का हऽ जनेव के धार्मिक आउर वैज्ञानिक महत्व? 

एकरा के धारण कइला से स्वास्थय के का लाभ मिली? एह सभ सवालन के जवाब हम एक एक कर के देब। सभसे पहिले आईं जानल जाव जनेव के धार्मिक महत्व के बारे में। सनातन धर्म के पहिचान: सनातन धर्म में प्रत्येक सनातनी(हिन्दू) के कर्तव्य हऽ जनेव पहिरल आउर एकरा नियमन के पालन कइल, काहे से कि जनेल पहिरला (धारण कइला) के बादे व्यक्ति के द्विजत्व मिलेला आ ओकरा यज्ञ तथा स्वाध्याय करे के अधिकार प्राप्त होला।

जनेव का हऽ? 

जनेव के देववाणी संस्कृत में ‘यज्ञोपवीत’ कहाला। ई नव तंतु से बनल तीन तागा वाला के होला, जवना के ब्राह्ममण बालक के पहिरावल जाला। जनेव के व्यक्ति बावां कान्ह के ऊपर तथा दहिना बांह के नीचे पहिरेले। माने कि ई गरदन में एह तरह से पहिरल जाला कि जनेव बावां कान्ह के ऊपर रहे। जनेव में तीनगो सूत्र (तागा) – त्रिदेव रुपी त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु आउरी महेश आउर देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक के रुप में सत्व, रज और तम के प्रतीक होला। साथहीं ई तीनों सूत्र गायत्री मंत्र के तीनगो चरणन के प्रतीक भी होला त ओहीजा जीवन के तीनगो आश्रमन के प्रतीक भी । यदि संक्षेप में कहीं तऽ जनेव के एक-एक तार में तीन-तीनगो तार होला। आ एह तरे जनेव में कुल्ह तार के संख्या नौ होला । एहमें से एगो मुंह, दूगो नासिका, दूनू आंख, दूनू कान, मल आ मूत्र के दूगो मिलाके कुल नौ गो कर्म के प्रतीक होला। एकरा के अइसे भी कहल जा सकता कि – हमनी मुख से नीमन बोलीं आउर खाईं, दूनू अंखियन से नीमन देखीं आउर कान से नीमन सुनीं। जनेव में प्रवर के अनुसार पांचगो चाहे तीन गो गांठ लगावल जाला जवन ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के भी प्रतीक होला। ई कुल्ह गांठ पांचगो यज्ञ, पांच ज्ञानेद्रि आउर पंच कर्म के भी प्रतीक होला।

जब जनेव के बात हो रहल बा त मन में एगो शंका उठेला कि जनेव के मानक लंबाई कतना होखे के चाहीं? ई प्रश्न के उठल भी स्वाभाविक बा, त आईं अब तनी जनेव के लंबाई के भी जान लिहल जाओ।

जनेव के लंबाई

जनेव के लंबाई के प्रमाण 96 अंगुल मानल गइल बा। काहे कि अइसन मानल जाला कि जनेव पहिरे वाला के चंउसठ(64) कला आ बत्तीस(32) गो विद्या के सीखे के प्रयास करे के चाहीं। बत्तीस(32) गो विद्या में चारु वेद, चारगो उपवेद, छवगो अंग, छवगो दर्शन, तीनगो सूत्रग्रंथ, नवगो अरण्यक आवेला। एही तरे चंउसठ(64) कला में वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि कला आवे ला। 

जनेव पहिने के बेरा बटुक(बरुआ) के हाथ में परास के के डंटा चाहे दंड जवन की ओह बरुआ के एड़ी से ले के ओकरा चोटी(शिखाबंध) तक लामा होला धरावल जाला। एह समय (जनेव पहिने के बेरा) बरुआ बिना सिअल एगो कपड़ा पहिरेला जवन प्रायः पीयर रंग में रंगल धोती के टुका होला चाहे लंगोटा होला। जनेव पहिरावे से पहिले बरुआ मंजी-मेंखड़ा दियाला ओकरा बाद सभ शास्त्रोक्त विधि वेवहार कइला के बाद बरुआ के मुंडन (केश छिलवावल) करावल जाला। मुड़न के बाद चोटी(टीक) राखल जाला।एकरा बाद शुद्ध जलसे (जवन कि अंगना में फुआ के द्वारा खोनल पोखरा) या गंगाजल मिलावल चांपाकल अथवा इनार के पानी होला ओकरा से सोहागिन लोग के संगे मिलके बरुआ के माई बरुआ के नहवावे ली। एकर प्रमाण हमनी के भोजपुरी गीतन में सुने के मिलेला

1.

पूछेली कवन फूआ अपनी धनी जी से
हो कवन धन पवलू पोखरा के खनाई जी
त हंसी हंसी कहेली धनी जी
हमरो कवन भइया रजवा के जनमल जी
हाथी देले घोड़ा देले देले सहर बजार जी
दूनू कान के बाली देले अउरी मे देले गले हार जी
इहे त देले सभ पोखरा के खनाई जी।

2.

केई गढ़े घइलवा केई भरे पानी लाल
कवन सुहागिन चलेली नहवावन लाल
कोहंरा जे गढ़ेला घइलवा कहरा भरे पानी लाल
अम्मा सुहागिन चलेली नहवावन लाल।

नहवावन के बाद बरुआ के गोड़ में पहिरे के लकड़ी के खड़ाऊं दियाला त ओहिजे डांड़ में बान्हे लाएक डोरा के जवन की मेखला कहाला दिहल जाला। मेखला कपड़ा के सीअल डोरा मौली के भी बनावल जाला। मेखला के संगे-संगे कोपीन जवन की लगभग 4 इन्च चाकर आ डेढ़ फुट लंबा लंगोटी होला पहिरावल जाला। जनेव के पीयर रंग में रंग के जहां जनेव हो रहल होला ओजी बेदी के लगे राखल जाला। बिना सीअल कपड़ा पहिर के, हाथ में एगो दंड लेके, कोपीन आउर मूंजी-मेखला पहिनके विधि-विधान से जनेव धारण कइल जाला। जनेव पहिरला के बाद जामा-जोड़ा जवन कि प्रायः बरुआ के ममहर से आवेला पहिरावल जाला आ ओकरा बाद ऊहां उपस्थित सभ महिला लोग बरुआ के चुमावन करेली आ बरुआ के जेतना भी लइकी बहिन लागेली सभ ओकर लापर परिछेली। लापर परिछे में एगो पत्तल में बरुआ के काटल केश में से कुछ केश आ मिठाई रखके बहिन ओकरा के बरुआ के माथ पर से पांच हाली घुमा के उतारेली एकरा बदला में उनका के नेग दिहल जाला। एही तरे बहिन चाहे फुआ बरुआ के सभ कपड़ा पहिरला के बाद आंख में काजर करेली जवना के भेद ईहे हs कि बरुआ के केहू के नजर ना लागो।

जनेव कब आउर कइसे धारण करे के चाहीं?

जनेव के पहिरे आ धारण करे के संबंध में शास्त्र में हई श्लोक देखे के मिलेला

सूतके मृत्केचैव गते मास चतुष्टये।
नव यज्ञोपवीतानि घृत्वाजीर्णानि संत्यजेत्॥

एह श्लोक अर्थ होला किः सूतक में ( बच्चा भइला पर) आ घर परिवार में केहू के मृत्यु हो जाओ अथवा मृतके अशौच में गइला पर आ चाहे नया जनेव पहिरला के चार महिना के बाद जनेव के बदल के फेर से नया जनेव पहिरल जाला आ पुरनका जनेव के उतार के कतहीं शुद्ध जगहा जइसे कवनो गाछ बिरीछ चाहे नदी में बहवा देवे के चाहीं। इहां धेयान देबे के चाहीं कि जनेव हरमेशा गरदन से ऊपर मुंहे निकाले के चाहीं। प्रमाण स्वरुप हई श्लोक देखीः-

जीर्ण यज्ञोपवीतं शिरोमार्गेण निःसार्य भूमौ त्यजेत।पश्चाद्यथाशक्ति गायत्रीमंत्र जपं कुर्यात।

जनेव पहिरे के बेरा हई मंत्र के बोले के चाही:-

ऊँ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥

जनेव उतारे के बेरा हई मंत्र बोले के चाहीः-

ऊं एतावाद्देनपर्यन्तं ब्रह्मत्वं धारितं मया।
जीर्णत्वा त्वंपरित्यक्तं गच्छसूत्र यथा सुखम॥

गायत्री मंत्र से शुरू होला ई संस्कार: यज्ञोपवीत संस्कार (जनेव के विधी) गायत्री मंत्र से शुरू होला। गायत्री आ उपवीत के सम्मिलन ही द्विजत्व होला। यज्ञोपवीत(जनेव) में तीनगो तार होखेला, आ गायत्री मंत्र में भी तीनगो चरण होला जहां ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ पहिला चरण, ‘भर्गोदेवस्य धीमहि’ दूसरा चरण,आ ‘धियो यो न: प्रचोदयात्’ तीसरा चरण ह

जनेव पहिरे के उमिर: हमनी के शास्त्रन में से एक मुहुर्तचिनतामणि के संस्कार प्रकरण में जनेव पहिला बेर धारण करे के भी उमिर बतावल गइल बा जवन कि श्लोक संख्या 39 से 60 तक में दीहल बा।

विप्राणां व्रतवन्धनम निगदितं गर्भाज्जनेवार्ष्टमे
वर्षेवाप्यथ पच्चमे क्षित्भुजांषष्ठेतथैकादशे।
वैश्यानां पुनरष्टमेsप्यथ पुनःस्याद् द्वादशेवत्सरे
कालोऽऽऽऽथ द्विगुणेगते विगहिते गौणंतदाहुर्वुधाः॥

ब्राह्मण के लइका के जनेव गर्भसे अथवा जन्मसे पांचवा अथवा आठवां बरिस में व्रत तेज खातिर जनेव करावे के चाहीं, क्षत्रिय के बलके इच्छा खातिर छठा चाहे ग्यारहवां बरिस में आउर वैश्य के धन के इच्छा से आठवां चाहे बारहवां बरिस जनेव होखे के चाहीं आ यदि कवनो कारण से बतावल उमिर में जनेव नइखे भइल त विद्वान लोग प्रत्येक खातिर दुगुना गौणकाल कहले बा लोग। हम पहिलहूं लिखले बानी कि जनेव पहिरला के बादे विद्यारंभ होखे के चाहीं, बाकिर आजकल गुरु परंपरा के समाप्त भइला के चलते अधिकतर लोग जनेव नइखे पहिरत, त अइसन लोग के बियाह के बेरा तिलक के दिने जनेव पहिरा दिहल जाला। बाकिर एकरा खाली एगो बिधी निमाहल ही जाने के चाहीं, काहे कि अइसन लोग जनेव के महात्तम के ना जानस। हमनी के सनातन ध्रम में कवनो धार्मिक काम, पूजा-पाठ, यज्ञ आदि करे के पहिले जनेव पहिरल जरुरी मानल गइल बा। सनातन धर्म में बियाह भी तबले पूर्ण ना होला जब तक कि जनेव धारण नइखे कइल गइल।

जनेव धारण के नियम

  1. मल-मूत्र विसर्जन(शौच) के बेरा जनेव के दहिना कान पर चढ़ा लेवे के चाहीं। एकरा बाद शौच से निवृत भइला पर से हाथ स्वच्छ कके ही जनेव के कान पर से उतारे के चाहीं। एकरा पाछा मूल भाव इहे बा कि जनेव डांर (कमर) से ऊंचा रहो आ शौचक्रिया के समय अपवित्र ना होखे। एह बात के धेयान राखल बेहद जरूरी होला।
  2. अगर जनेव के कवनो तार टूट जाए या 4 महिना से अधिका समय हो जाए, त जनेव के बदल देवे के चाहीं। खंडित जनेव के देह पर ना राखे के चाहीं। धागा कच्चा आउर गंदा होखे लागे, त पहिले ही बदल दिहल उचित रहेला।
  3. घर में जन्म-मरण के सूतक/छूतक के बाद भी जनेव के बदल देवे के परम्परा बा। इहां एगो बात आउर बा कि जवना महिला के गोदी में छोट लइका ना होखे उहो चाहो त जनेव पहिर सकेली बाकिर हर महिना मासिक धर्म (रजस्वला) से निवृत भइला के बाद जनेव के बदल लेबे के चाहीं।
  4. जनेव के कबो अपना देह से अलग ना कइल जाला। यदि जनेव के साफ भी करे के बा त ओकरा के गरदन में पहिरले चारु ओर से घूमा के साफ करे के चाहीं। यदि गलती से जनेव उतर जाए त एक माला गायत्री मंत्र के प्रायश्चित खातिर जाप करके पहिरल जा सकता बाकिर परंपरा के अनुसार अइसन स्थिति में जनेव के बदल लिहल ही श्रेयस्कर रहेला।
  5. लइका जब एह नियमन के पालन करे लाएक हो जा सन तबे जनेव करे के चाहीं।

जनेव के वैज्ञानिक महत्व

  1. बार-बार बाउर सपना आवे के इस्थिति में जनेव पहिरला से अइसन समस्या से छुटकारा मिल जाला।
  2. जनेव के हृदय के लगे रहला से ई हृदय रोग के संभावना के कम करेला, काहे कि एकरा से रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होखे लागेला।
  3. जनेव पहिरे वाला व्यक्ति साफ-सफाई के नियमन में बन्हाइल रहेला, आ साफ-सफाई पर विशेष धेयान देला। ई सफाई ओकरा के दांत, मुंह आ पेट में कीड़ी आ जीवाणुअन के रोग से बचावेला।
  4. जनेव के दहिना कान पर धारण कइला से कान की ऊ नस दबाला, जवना से मस्तिष्क के कवनो सुतल तंद्रा भी करे लागेले।
  5. दहिना कान के नस अंडकोष आउर गुप्तेन्द्रियन से जुड़ल होला। मूत्र विसर्जन के समय दहिना कान पर जनेव लपेटला से शुक्राणुअन के रक्षा होला।
  6. कान पर जनेव लपेटला से मनुष्य में सूर्य नाड़ी के जाग्रण होखे ला।
  7. कान पर जनेव लपेटे से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप के समस्या से भी बचाव मिलेला।
  8. जनेव पहिरला से विद्युत प्रवाह रेखा नियंत्रित रहेला, जवना से काम-क्रोध पर नियंत्रण(काबू करे में) राखे में आसानी होखेला।
  9. जनेव देह पर रहला से पवित्रता के अहसास होला। ई मन के बाउर काम करे से बचावे ला।
  10. जनेव से कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रेन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोग सहित अन्य संक्रामक रोग ना होखे।
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लेखक परिचय:-
नाम: राम प्रकाश तिवारी 
बेवसाय: सहायक प्राध्यापक, 
टेक्निया इंस्टीट्युट ऑफ ऐडवांस्ड स्टडीज़
गाजियावाद (उ. प्र.) 




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