बुचिया - गणेश नाथ तिवारी 'विनायक'

"अरे बुचिया! ई का होइ? किताब!!"
"सब फेकऽ फाकऽ, किताब आ डिग्री ई कुल लइकन के हाथे निमन लागेला"।
"आज ई सब किताब फ़ार फूंक दे तानी।"

लईकी रोवत चिलात, " ना बाबूजी अइसन मत करीं, हम पढ़े चाहत बानी"।

बाबूजी चिलात कहले कि, " रे बुचिया !!चुपचाप जो घर में।"

पाकिट से मोबाइल निकलने आ पण्डित जी से फोन लगा के कहले कि, "पण्डित जी बुचिया के हाथ पियर करे के बा, जल्दी से कवनो निमन लइका बताई।"

बुचिया बाबूजी के गोड़ धऽ के रोवत फेरु से कहलस, "हमरा पढ़े के बा, आ पढ़ के निमन नोकरी करे के बा, तहार नाम आगे बढ़ावे के बा।"

बाबूजी कहले कि, "ते मनबे ना! हमार नाक कटवइबे! एकरा ले तऽ निमन रहित की हम तोरा के जनमते मुआ देले रहिती! हई दिन ना नु देखे के पारित!"

फेरू माई से कहले कि, "सुन तारू हो! बुचिया के माई, इहे सिखवले बाड़ू एकरा के? ई सब तहार देन ह। एकरा कुछ लूर ना आवेला।"

बुचिया कहली, " बाबूजी हम अभी छोट बानी! हंमरा खाना बनावे ना आवेला!"

"एक बेर कह देहले! ससुरा में मति कहिहें। ना त तोरा के माटी तेल डाल के जार दिहे सन!"

"देखलु हो बुचिया के माई! ई हमरा से ज़बान लड़ावत बिया? तू आ तहार बेटी कबो ना सुधरबो लो"

एतने कह के खेत में चल गइले, वापस अइले त बुचिया घर छोड़ के चलि गइल रहे।

रोज बुचिया के माई के ताना दिहल गारी दिहल चालू कइले।
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बुचिया शहर की ओर रास्ता बढ़ा देले रहे। मन में इहे ठनले रहे कि चाहे कुछ्वु करे के पडे़," हम पढाई ना छोड़ब!"

B.H.U. में एडमिशन मिलल आ लड़की डॉक्टरी के पढाई पढ़े लागल ।

एने उनकर ताना सुन सुन के उनकर माई चल बसली। बाबू बेचारू अकेले गम में दारू के नशा ध लिहले। एक दिन उनके एक्सीडेंट हो गइल।

संयोग से उ लड़की डॉक्टर बन गइल रहे आ उनके जान बचवालस।

फिर उनके साथी एकजना कहले कि डॉक्टर साहिबा जान बचवली ह त कुछ सोच के बुचिया के बाबू मिले के इच्छा जाहिर कइले।

डॉक्टर साहिबा अइली त कहले की "हम ई एहसान कब्बो ना भुलाइब।" तब लड़की कहलस की , "बाबूजी हम बुचिया! राउर एहसान कइसे चुका पाएब! याद बा रउरा कहले रहनी की जनमते मार देले रहिती! आज बचन दी कबो कवनो लईकी से ई ना कहब की लईकी कुछ नइखे कर सकत।"
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मैना: वर्ष - 7 अंक - 117 (जनवरी - मार्च 2020)

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