सिपाही सिंह 'श्रीमंत' के तीन गो कविता

बनल रहे बिसवास

बनल रहे बिसवास बटोही, धीमा पड़े न चाल
मंजिल दूर, थथम के बइठल, भाई रे, बा काल
खाली सपना काम ना आई मन मोदक से भूख ना जाई
बुनी पकड़ के चढ़ल गगन में अइसन केहू नाम न पाई

बाजी मरलस उहे, कि जे तेरुआर धार पर दड़रल,
देख बिछल अंगार राह में, मन में तनी न मउरल
मन के जीते जीत बटोही, मन के हारे हार,
बल बटोर से बढ़त गइल जे, सेही चहुँपल पार

जे कदराइल, से भहराइल, सहुरल ना ऊ लाल
मंजिल दूर, थथम के बइठल, भाई रे, बा काल
उनहल देख नदी के, सिहरल, कइसे जाई पार
दुबिधे में रह गइल, किनारे पर बइठल मन मार

रोअत रही बइठ उहँईं ऊ हाथे पकड़ कपार
बातो पूछे पास न आई कायर के संसार
कि चूमी चरन, नवाई माथ, ई दुनिया हरदम तइयार,
लेकिन कायर के ना, मरदाना के, जे ना माने हार

जे ना माने हार, हथेली पर ले घूमे प्रान
टूटे त टूटे लेकिन ना झूके वीर जवान
बहत रहे तूफान राह में, हहरत रहे समुन्दर,
पकड़ पथिक पतवार हाथ में, का कर सकी बवंडर,

हिचक हटा के ढीठे ले चल, नाव उड़ा के पाल,
मंजिल दूर, थथम के बइठल, भाई रे, बा काल
कइसे के पाई गुलाब, जे काँट देख के काँपे,
मोती भला मिली कइसे, बाहर से पानी नापे

काँटन में गमके गुलाब, गहिरे पानी में मोती,
जहरीला मनियारा का पाले बा मनि के जोति
प्यार काँट के जे कर पाई, सूँघी उहे गुलाब,
गहरे पानी पइठ सकी, पाई मोती के आब

मोह माथ के छोड़ चली जे, मनियारा का पास
ओकरे बा अधिकार कि ऊ, कर पाई मनि के आस
कूद सकी जे कालीदह में, नाथ सकी जे नाग,
बजा सकी बाँसुरी, जगत के जीत सकी अनुराग

सनमुख उगिलत जहर नगिनिया, चाहे धधकत आगी,
बढ़ी लक्ष्य पर डेग, त संकट खुदे डेरा के भागी
पथ के बाधा देत चुनौती, तेज करे के चाल
मंजिल दूर, थथम के बइठल, भाई रे, बा काल
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आँधी

गूमसूम-गूमसूम तनिको ना भावे हमें
आँधी हईं आँधी, अंधाधुंध हम मचाइले
नास लेके आइले, कि नया निरमान होखो
नया भीत उठेला, पुरान भीत ढाहिले।

ढाहिले पुरान, जीर्ण-शीर्ण के झकोरा मार
बुढ़िया सम्हारे तले ढाह ढिमिलाइले
नइकी पतइयन के दुनिया सँवारेला
पाकल पतइयन के भुँईं भहराइले।

कोठा वो अमारी सातखंड में लुका के सूते
ओकरो करेजवा में कँपनी ढुकाइले
कोठा का जे चारु ओर हाहाकार उठे
ओमें कोठा के गिरावेवाला बल, ई बताइले।

सुविधा सहोट के जे बइठल कंगूरा पर
कलसा गुमानी लो के मुड़िया ठेंठाइले
हो-हो क-के, हू-हू क-के, दउर-दउर बार-बार
मार के निछोहे गवें चसकल छोड़ाइले।

बइठ के निचिन्त हरियरी का अलोता जे
रात-दिन खाली चोटिए सँवारेले
अइसन पहाड़ लो के टीकवे उखाड़ ली-ले
मार के झकोरा उनुकर बबुरी बिगड़िले।

बड़-ऊँच लमहर रोके के जे राह चाहे
ओह लो का हस्ती के माटी में मिलाइले
छोटे-छोटे, हलुक-हलुक, नन्हीं-नन्हीं मिले
ओके गोदी में उठा के आसमान में खेलाइले।

केहू के उठाइले, गिराइले केहू के हम,
आँधी हईं आँधी, अंधाधुध हम मचाइले
घेर आसमान के अन्हार घोर घटा करे
फुँक-फाँक रुई लेखा ओके उड़िआइले।

बइठल-बइठल धरती के रस चूस
चूस जिएवाला लो के आँख पर चढ़ाइले
भारी-भारी मोट-मोट, ढेर-ढेर पत्तावाला
गाछ लो का फुनुगी के माटी में सटाइले।

छतिया उतान क-के, मन में गुमान क-के
नवे के ना चाहे, ओके दूर से तिकाइले
किनहूँ के घेंट पर से मुंड़िए अँईंठ दिले
किनहूँ के साफ जर-सोर से गिराइले।

दिन-रात लात से जे सभे दरमसे, ओहू
धुरा-खरपात में भी जिनगी जगाइले
नीचा रहेवाला लो के नीचा से उठाइले
त बड़-बड़ ऊँच लो का मूड़ी पर चढ़ाइले।

रुख हमर देख-देख दूभ लेखा काम करे
सिरवा नबावे ओके कुछ ना बिनाड़िले
अईंठल-अँकड़ल राह रोक खड़ा होखे
खाली हम ओही लो के चिन्ह के उजाड़िले।
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जिनगी के गीत

सीखऽ भाई जिनगी में हँसे-मुसुकाए के।।

इचिको ना करऽ पीर-तीर के खिअलवा, सिहरऽ ना सनमुख देख मुसकिलवा।
नदी-नाला-परबत फाने के हियाव राख, मुँहवा सुखावऽ ना ई रोड़ा-रोड़ी देख के।
डगरी जिनगिया के टेढ़े-मेढ़े बाटे, भइया, हार ना हिया में सीख मस्ती में गावे के।।

अंगे-अंगे छलनी बनावे काँट-कुसवा, रस लूझे, लेके भागे, स्वारथी भँवरवा।
तबहूँ गुलाब का ना मन में मलाल आवे, गमकि-गमकि करे जग के निहलवा।
रोज फुलवरिया से आवेला सनेस इहे, काँट में गुलाब लेखा सीख अगराए के।।

आन्ही बहे, पानी पड़े, पत्थर से थुराइह, तबहूँ ना पीछे मुँहें बन घुसुकइह
सामने समुन्दर चाहे बड़का पहाड़ मिले तबहूँ ना पीछा मुँहें डेग घुसुकइह।
अमरित पीए के त सभे तइयार बाटे, जहर पी के सीख नीलकंठ कहलाए के

घिरल घटा देख के डेराइले नादानी बा, कवन परवाह यदि पास में जवानी बा
जांगर का भरोसे चीर बादर के करेजा, ओमें बिजली के जोत, ओमें जिनगी के पानी बा।
बिना जोत-पानी के जे घटा-घुटी आवे, सीखऽ तेज सांस का बेआर से उड़ावे के।।

दुखवा का लकम जिनगी के डेरवावे के, हमनी का चाहीं ओके लाते लतिआवे के।
ठोकि-ठोकि खम, अठे साहसी कदम, इहे ढंग हवे हारलो त बाजी पलटावे के।
रोज-रोज भोरहीं जगा के कहे उषा रानी, सीखऽ भाई दुखवो में सुख छितरावे के।।
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