संदीप राज़ आनन्द के तीन गो कविता

भारत माँ के वीर सपूत

जान भले तू दे दिह पर पीछे ना कदम हटईह तू।
ए भाई अब घर में घुसी के दुश्मन क मार गिरईह तू।

बहुत भइल अब गुंडागर्दी बहुत भइल मनमानी हो
सुलह बहस से काम ना चलि खतम कर ई कहानी हो
बस एक्के उपाय बचल आतंक के समूल मिटईह तू।
ए भाई अब घर में घुसी के दुश्मन क मार गिरईह तू
जान भले तू दे दिह पर पीछे ना कदम हटईह तू।।

कबले कवनो माई आपन अचरा अइसे भेवत रहीं
कबले माँग क सेनुर उजड़ी बाप बेचारा रोवत रहीं
भारत माँ के वीर सपूत अब आपन फर्ज निभईह तू।
ए भाई अब घर में घुसी के दुश्मन क मार गिरईह तू।
जान भले तू दे दिह पर पीछे ना कदम हटईह तू।।
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छुपवली उ काहे

छुपवली उ काहे बतवली काहे ना।
जे रहल मोहब्बत जतवली काहे ना॥

अँखिया से अँखिया मिलावत त रहली
इशारा में हमके बोलावत त रहली
पर उनकर इशारा बुझाइल ना हमरा
लजइली उ काहे समझवली काहे ना।
छुपवली उ काहे बतवली काहे ना॥

उ खिड़की से झांकल छत प से ताकल
देखी हमरा के उनकर शरमा के भागल
जमाना के डरे हम आगे ना अइनी
डेरइली उ काहे बोलवली काहे ना।
छुपवली उ काहे बतवली काहे ना॥
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फागुन के मौसम

चढ़ल बाटे जबसे फागुन के मौसम
बहे ला चारों ओर बसंती बयरिया।
सजल बाटे सपना, लगल बाटे आशा
हो अहिए सजनवां, रे अहिए सवारियां।

बहुत दिन बीतल, बहुत रात बीतल
दिल में दबावल, बहुत बात बीतल
बीतल अब जाता जाड़ा के जड़ईयां
झूमि के कहे अब अमवां के मोजरियां
हो अहिए सजनवां, रे अहिए सवारियां।

कहवाँ निक लागे उ कोयल के बोली
देखी पूनम के चनवा लगे हिय गोली
कहे फूल सरसों ई गाछी पतईयां
उ भूसा भुसउला, कहे छानी मड़ईयां
हो अहिए सजनवां, रे अहिए सवारियां।
हो अहिए सजनवां, रे अहिए सवारियां।।
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लेखक परिचय:-
नाम: संदीप राज़ आंनद
संक्षिप्त परिचय-छात्र,स्नातक (हिन्दी साहित्य) इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय
प्रयागराज (उत्तरप्रदेश)
सम्पर्कसूत्र-7054696346
ग्राम-अहिरौली,पोस्ट-खड्डा
जनपद-कुशीनगर(उत्तरप्रदेश)

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