डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के पाँच गो फगुआ

फगुआ में मातेले जवान

फगुआ में मातेले जवान
हो लाला फगुआ में मातेले जवान।
आहे अंगना में सिलवा प भङिया पिसाला।

रंग में गोताला मएदान।
हो लाला रंग में गोताला मएदान।
आहे अबिर-गुलाल के बरखा बुझाला।

घर -घर पाके पकवान
हो लाला घर -घर पाके पकवान।
आहे छपनो बिंजन खाके फगुआ गवाला।

गमकेला सगरो सिवान
हो लाला गमकेला सगरो सिवान
आहे अतरे में बुढ़वो फगुनवा नहाला।
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मारले रंग पिचकारी

बरिज कन्हैया के तनिका ए मइया
मारले रंग पिचकारी।

एने से मारेले ओने बचाई
चारू ओरि रंगवा से दिहले भिंजाई
दिहले सुरतिया बिगारी।

भींजल देंहिया जो बाबा निरेखिहें
के ई कइल दुरगतिया ऊ पुछिहें
सोचिहें ना आगा-पिछारी।

कहतारे काल्हो जरूरे तू अइह
मन ना भरल फेरु रंग डलवइह
तोहरा प रंग बा उधारी।

सुनिके जसोदा जी मन मुसकानी
राधा-कन्हैया के प्रेम के कहानी
केकर मजाल जे सुधारी।
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फाग रे

लागेला रस में बोथाइल परनवा
ढरकावे घइली पिरितिया के फाग रे।

धरती लुटावेली अँजुरी से सोनवा
बरिसावे अमिरित गगनवा से चनवा
इठलाले पाके जवानी अँजोरिया
गावेला पात पात प्रीत के बिहाग रे।

पियरी पहिरि झूमे सरसो बधरिया
पछुआ उड़ा देले सुधि के चदरिया
पिऊ पिऊ पिहकेला पागल पपिहरा
कुहुकेले कोइलिया पंचम के राग रे।

मधुआ चुआवेले मातल मोजरिया
भरमेला सब केहू छबि का बजरिया
भींजेले रंग आ अबीर से चुनरिया
गोरिया बुतावेलिन हियरा के आग रे।
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फागुन के आसे

फागुन के आसे
होखे लहलह बिरवाई। डर ना लागी
बाबा के नवकी बकुली से
अङना दमकी
बबुनी के नन्हकी टिकुली से
कनिया पेन्हि बिअहुती
कउआ के उचराई। बुढ़वो जोबन राग अलापी
ली अङड़ाई
चशमो के ऊपर
भउजी काजर लगवाई
बुनिया जइसन रसगर
हो जाई मरिचाई।

छउकी आम बने खातिर
अकुलात टिकोरा
दुलहिन मारी आँखि
बोलाई बलम इकोरा
जिनिगी नेह भरल नदिया में
रोज नहाई।
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असो जाए फगुनवा ना बाँव सजना


असो जाए फगुनवा ना बाँव सजना
कुछो हो जाए अइह तू गाँव सजना। काल्हु बुधनी के डेगे ना हेठा परे
ओहके फुरसत ना हमरा से बातो करे
ओकर दुलहा जे पाती पेठवले रहल
संग रङ आ अबीरो भेजवले रहल
बा बढ़ल ओकर टोला में भाव सजना। असो छवरी के अमवो बा मोजरा गइल
पिछुवरिया के कनइलवो कोंढ़िया गइल
रोज गाके कोइलिया डोलावेले मन
तोहसे मीले के सपना देखावे सजन
कान तरसेला सूने के नाँव सजना। रोज रोटी आ दूधे कटोरा भरीं
तनी उचरऽ ए कागा निहोरा करीं
आँखि पथराइल देखे में रहिया पिया
केहू बूझे दरद ना विमल के हिया
लागे केकरो ना बोली सोहाँव सजना। हो गइल दिन बहुत रंग खेलल पिया
मुसकराइल हँसल अउर चहकल पिया
अबकियो जो ना अइबऽ त कइसे जियबि
कइसे तोहरा बिना हम ससुरवा रहबि
तोहरा बिन लागे घरवा उबाँव सजना।
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लेखक परिचय:-
नाम: डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
जन्म: बड़कागाँव, सबल पट्टी, थाना- सिमरी
बक्सर-802118, बिहार
जनम दिन: 28 फरवरी, 1962
पिता: आचार्य पं. काशीनाथ मिश्र
संप्रति: केंद्र सरकार का एगो स्वायत्तशासी संस्थान में।
संपादन: संसृति
रचना: ‘कौन सा उपहार दूँ प्रिय’ अउरी ‘फगुआ के पहरा’
ई-मेल: rmishravimal@gmail.com

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