राजीव उपाध्याय के चार गो कविता

फेर काँहे सुनेनी हम तोहार बतिया

उठि सूती पूछे मन, एगो हमसे बतिया
काहे खाती दिन बावे, काँहे खाती रतिया॥

रोज भिंसहरे काँहे, किरिन सूरुजवा
अउरी अन्हियारा, काँहे रोजे-रोजे रतिया॥

काँहे लोग मिलेला, अउरी जाला कहवाँ
फेर गीतिया सुनावेला, हमके दिन-रतिया॥

इहे साँच बावे कि, हम नाही केहू हवीं
फेर काँहे सुनेनी, हम तोहार बतिया॥
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मतलब तोहरो से कुछू निकलत होई

मन-मन सोचि-सोची काँहे मुसका लऽ
केहू ना केहू सूनले तऽ होई।
बात जेवन तूँ कहब केहू से
केहू ना केहू कहले तऽ होई॥

कुछू नाही बावे तोहसे इहाँ
तोहरे से सभ कुछ, सभका से तूँ।
इहे बावे रीत-मीत सगरे इहाँ
केहू ना केहू मिलले तऽ होई॥

रूप सिंगार सभ बावे मतलब के
आदमी जीएला पी के जहर के।
एने-ओने छपिटा के काँहे अहकत बाड़ऽ
मतलब तोहरो से कुछू निकलत होई॥
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फंसरी में जीव परेला

कबो-कबो अइसन होला
कि फंसरी में जीव परेला।

रहिया ओढन बासन-डासन
बाति सगरी हो जाला गुमानी
जइसे सरसों के फूल पर
लाही जाड़ा में गिरेला।

तूरि के खुँटा काहाँ ले जइब
चारू ओर चघोटब-रेघइब
फेर भइला पऽ सँझवत
मन डहरी घर के धरेला।

गइयो हँ भँइसियो हँ, सभे हँ
इहे जिनगी में घोराइल
कि बा फाँस गजबे कसाइल
कि अँखिया से लोर के रेला।
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डरे से बानी हम

सबेरे-सबेरे
निकलेनी जब काम पऽ अपना
तऽ साँझी के खाना के
मेयन बता के जानी
कि वादा रहेला
लवटि के आइब साँझी खा जरूर।

जब दिन में आवेला फोन कई बेर
झुझुआ जानी जब हम
तऽ बिहसि रिगावेली
हँसेली खुब
कि ठीक बा सभ।

रोज साँझी खा
लेनी हाल-चाल उनकर
तऽ खिसिया कहियो डपटस
‘बुझ तानी!
बाप हवीं तोहार हम।‘

का करीं?
डरे से बानी हम!
बा भरल सगरे काज हमार।
अँगुरियो टोवत रहेनी
बगली से
निकाल-निकाल के हम।
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लेखक परिचय:-
नाम: राजीव उपाध्याय
पता: बाराबाँध, बलिया, उत्तर प्रदेश
लेखन: साहित्य (कविता व कहानी) एवं अर्थशास्त्र
संपर्कसूत्र: rajeevupadhyay@live.in
दूरभाष संख्या: 9650214326
ब्लाग: http://www.rajeevupadhyay.in/
फेसबुक: https://www.facebook.com/rajeevpens



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