महेंद्र मिश्र के चार गो कविता

हम त जनलीं कि बबुआ इनाम दीहें

हम त जनलीं कि बबुआ इनाम दीहें।
हम नाहीं जनलीं कि जाने लीहें। बबुआ।

केकई कारण हम अता दुख सहतानी
लाखन सिकाइतो खूब सहलीं रे बबुआ।

बिना अपराधे हम कुटनी कहावतानी
मारि-मारि हलुआ बनवलऽ हो बबुआऽ।

कहाँ ले इनाम मिली नाम वो निशान रही
उलिटा में जानवाँ गँववली हो बबुआ।

जानकी लखनराम बन के गमन कइले
दुनिया में अजसी कइहलीं ए बबुआ।

इज्जत के पहुँच गइनीं दूधवा के माछी भइली,
एको नाहीं सरधा पुजवल ऽ ए बबुआ।

केनियो के नाहीं भइनी दुनू तरफ से गइनी
सगरे से पापिनी कहइनी रे बबुआ।
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भोरहीं के भूखे होइहें चलत पग दूखे होइहें

भोरहीं के भूखे होइहें चलत पग दूखे होइहें
प्यासे मुख सूखे होइहें जागे मगु रात के।

सूर्य के किरिन लागी लाल कुम्हिलाये होइहें
कंठै लपटाय झंगा फाटे होइहें रात के।

आली अब भई साँझ होइहें कवनो बन माँझ सोये होइहें
छवना बेबिछवना बिनु पात के।

महेन्द्र पुकारे बार-बार कौशल्या जी कहे
ऐसे सुत त्यागी काहे ना फाटे करेजा मात के।
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मउजे मिश्रवलिया जहाँ विप्रन के ठट्ट बसे

मउजे मिश्रवलिया जहाँ विप्रन के ठट्ट बसे
सुन्दर सोहावन जहाँ बहुते मालिकान है।

गाँव के पश्चिम में बिराजे गंगाधर नाथ
सुख के सरूप ब्रह्मरूप के निधाना है।

गाँव के उत्तर से दक्खिन ले सघन बाँस
पुरूब बहे नारा जहाँ काहीं का सिवाना है।

द्विज महेन्द्र रामदास पुर के ना छोड़ों आस
सुख-दुख सभ सहकार के समय को बिताना है।
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ई त बूढ़वा दुलहवा बड़ा मजेदार

ई त बूढ़वा दुलहवा बड़ा मजेदार।
अटपट बोले मगर बाटे होसियार।।

पूरी कचवरी अउर हलुआ खिलाइबों,
चीनी के नीमकी अउर आम के अँचार।
ई त बूढ़वा दुलहवा बड़ा मजेदार।

डिमिक-डिमिक ई त डमरू बजावेलन,
सोहली गंगाजी उनका जटवा के हार।
ई त बूढ़वा दुलहवा बड़ा मजेदार।

ओढ़े के देइब हम सालवा दोसालावा,
खाए के देहब इनके सोनवाँ के थार।
ई त बूढ़वा दुलहवा बड़ा मजेदार।

निरखे महेन्द्र दुल्हा दुलहीन के सँगवा हो,
छूट गइलें हमरो अब जम के दुआर,
ई त बूढ़वा दुलहवा बड़ा मजेदार।
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लेखक परिचय:-
नाम: महेंद्र मिश्र (महेंदर मिसिर)
जनम: 16 मार्च 1886
मरन: 26 अक्टूबर 1946
जनम स्थान: मिश्रवलिया, छपरा, बिहार
रचना: महेंद्र मंजरी, महेंद्र विनोद, महेंद्र चंद्रिका,
महेंद्र मंगल, अपूर्व रामायन अउरी गीत रामायन आदि

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