डॉ प्रमोद कुमार पुरी के पाँच गो कविता

तेज दिहलु

माई
तू हमके
तेज दिहलु
काहे कि हम
एगो लईकी हई
माई.....

कोख में
आवते ही
घर भर संग मिली
गर्भ में मुआवे खाति
तुहूँ तयार हो गईलू ...
माई.....

ए माई
तुहूँ त बेटी हऊ
कईसे हम बोझ हई
देवी जे पुजेलु उहो त बेटी हई
बेटी कहाँ बेटा से कम बाड़ी
माई.....

आजू ना जे बुझबु
हमके जिअते जे मुअईबू
लईकी ना बचिहें दुनियां में
त ए माई ! सुन ना ?
भाई खाति कनिया कहंवा से लिअईबु?
माई.....
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जात-पात के जहर

जात-पात के जहर,
मन में बो रहल बा आदमी!
आपस के प्यार सब,
अब खो रहल बा आदमी!
जात-पात के जहर .....


का होला मेल मिलाप,
हँसी ठिठोली टोनहा बोली!
जरतुआहि के फेरा में,
अब रो रहल बा आदमी!
जात-पात के जहर .....

होली दिवाली छठ व्रत,
ईद दशहरा ओरा गईल!
अपना के निमन कहावे में,
देखीं का हो रहल बा आदमी!
जात-पात के जहर .....

पटीदार पर विपद पड़े,
केहू मुए त ख़ुशी मनावे!
इ जिनगी जिनगी ना ह,
बस ढो रहल बा आदमी!
जात- पात के जहर
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देश बनवले आन्हर-कोढ़ी

धर्म-आडम्बर के चादर ओढ़ी
देश बनवले आन्हर-कोढ़ी!

बखत पर नून रोटी ना जुरत बा,
केहू घीव ढार-ढार पिअत बा!

घर के भीतरी आग लागल बा,
देख पड़ोसी भाग चलल बा!

कइसे केहू से आस लगइबअ,
भाई -भाई में लउर चलल बा!

भइल सगरो इहा खींचातानी,
का मरदाना का होखस जनानी!

कहे मनमौजी कव दिन के जिनगी,
हँस- बोल के काटअ ना त सुनगी!!
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कब बदल जाई

जिनगी के सुरुज,
जाने कब ढल जाई!
आदमी के का भरोसा,
कब बदल जाई!!

बड़ भाग्य से इहा,
मिलल मनुज तन,
माया लोभ में लिपटल,
रहे अबूझ मन,
सुख –दुःख में अझुराइ
समे निकल जाई!
आदमी के का भरोसा,
कब बदल जाई!!

जात- पात के झगड़ा,
बेमेल के रिश्ता,
पर पटीदार के संघे,
केस दू चार किता,
नीमन –बाउर करे में,
खेत बिकल जाई!
आदमी के का भरोसा,
कब बदल जाई!!

दू दिन के दुनिया,
हँस बोल के बीता ल,
बिगड़ल जवन जेसे
मनमौजी तु बना ल,
झुकिह केहू के आगे
जेतना झुकल जाई!
आदमी के का भरोसा,
कब बदल जाई!!
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देह से बा बड़ियार

अपने हाथ से खोनत देखीं
आपन उ त क़बर बा,
देह से बा बड़ियार बाकिर
दिल से उ त अबर बा।

खाली हाथ उ आइल रहे,
खाली हाथ ही जाइ,
पाई -पाई जोड़े फिर भी
देखीं केतना सबर बा।
देह से बा बड़ियार ....

गारी-मार, ताना उलाहना,
सहत बीतेला जिनगी,
आह तक ना करे मुँह से
हौसला केतना जबर बा।
देह से बा बड़ियार ....

नाता-रिश्ता, हित-मीत,
सभके लेके चलत बा,
घिंचें जेतना घिंच सको से,
जईसे जे उ रबड़ बा।
देह से बा बड़ियार ....

माई -मेहरारू, बाप-बेटा के,
चाहत पूरा करत बा,
पियेला हर घूँट जिनगी के,
भले जे उ जहर बा।
देह से बा बड़ियार ....
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लेखक परिचय:-
नाम: डॉ प्रमोद कुमार पुरी
पता: स्नेहा हेल्थ एंड एजुकेशनल ट्रस्ट, म0 नं0 67 बी 1
डॉ आंबेडकर कॉलोनी, बिजवासन , नई दिल्ली-110061
जनम थान: गाँव - नसीरा मठिया , पोस्ट - कोहड़ा बाज़ार
थाना - दाऊदपुर, छपरा - 841205
जनम दिन : 28 जनवरी 1981
कार्य: चेयरमैन (स्नेहा हेल्थ एंड एजुकेशनल ट्रस्ट ) नई दिल्ली,
चिकत्सक (ममता क्लीनिक)
दूरभाष :- 9313743740




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