इआ के गठरी - दिनेश पाण्डेय

बूढ़ी इआ तूनेली कपास।

कज्जल झँपोलिया से गठरी निकासि लेली,
पुरबारी ओसरी भि' चदरी उकासि देली।
खुले लागल मद्धिम उजास।

नीलही चदरिया पऽ पैरेली भुचेंगनी।
रुइया के फहवा-सी फूटेली तरेंगनी।
फूट-फूट नदी में दहास।

तूनि-तूनि पूनी सहियारेली फलक मधे,
भर घरे बखरी-बधारी तबो कहाँ सधे,
इयवा के जीयवा धधास।

कनिया बयारि बउरी डोलेली कने-कने?
फेरली बढ़नियों ना आजुले नीमन मने,
सगरी उड़ेला भुँइए कास।

किरनी पसारि गइलसि कुसुम्भी चुनरिया के।
परगट होला भेद राति खा के चरिया के।
नवकिन के छुपे ना हुलास।

बुतरु चुरुँगनन के भोरे चाहीं दाना-पानी।
सबकुछ बेंड़ि देबि, पेटवा न छाना मानी।
श्रम बिना मेंटी ना उपास।

गाछिन के जुलुफी प चिपकेली धूप धारी।
पंडुकी जुगल गावे मंदराग मनहारी।
टांगि देली गठरी उँचास।
--------------------------------
लेखक परिचयः
नाम: दिनेश पाण्डेय
आवास संख्या - 100 /400,
रोड नं 2, राजवंशीनगर, पटना - 800023.
मो. न.: 7903923686

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.