माई - ऋषि कांत उपाध्याय

माई कऽ रुपवा अनूप बा जगतिया में
बतिया बा जिनगी कऽ राह।
माई बाड़ी चंदवा-सुरुजवा कऽ किरनिया
उनकर अचरा बा शीतल छाँह॥

कइसे भुलाई माई बचपन कऽ दिनवा
जब रहलू हमर हथ-पाँव।
हमारे नींद-जागत -सोवत रहलू जइसे
गंगा-जलवा में लहरत नाव॥

हमके निरख भूल गइलू सबै दुःख
सुखवा कऽ धइके धियान।
एक हम स्वार्थी न बुझली दरद तोर
न कइली तोर ममता कऽ मान॥

बड़ होई गइली ,तोहे बिसरौली
हम कईली बहुत गुनाह।
तोहरे दुधवा क कर्जा चुकावे के बा माई हो
हमके अचारा में दे दऽ पनाह॥
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माई - ऋषि कांत उपाध्याय, Bhojpuri kavita, भोजपुरी कवितालेखक परिचयः
नाम: ऋषि कांत उपाध्याय
संप्रति: अध्यापक
संपर्क सूत्र: 7766023423

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