अदरा के संग बदरा - देवेन्द्र कुमार राय

पानी बदरा के धरती से जसहीं मिलल
सुखल माटी के अंचरा फहराए लागल,
सोन्ह माटी के गमक गगन में उड़ल
तिनका तिनका खुशी में लहराए लागल॥

धरती के मांगि हरिअर टिकुली निरेख
नयकी कनिया के उपमा दिआए लागल,
जतना रहले बरतीहा एह मौसम के संग
पागल पुरवा के रुप प धाधाए लागल॥

फेंड़ के डार्हि पात लागे सिंगार कइले बा
नेह बदरा के पाइ सभ कुलबुलाए लागल,
अदरा बदरा के संगे बिहंसि के चलल
गीत खुशी के चहुँ दिश में गवाए लागल॥

चंवर डोलाए नीमीआ झुमि झुमिके
देखि पीपरा के पात झरझराए लागल,
नीर नेह अपना गोदिया में सहोरल देख
अदरा बदरा के संग झमझमाए लागल॥

परदा बदरा से लुकि छिपि सुरुज झांकेला
देखि बदरा के कजरा कीरीनीया लजाए लागल,
राय छन छन में बदरा बदल लेता रुप
एही सांवर सुरत प मन लोभाए लागल॥
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लेखक परिचयः
नाम: देवेन्द्र कुमार राय
जमुआँव, पीरो, भोजपुर, बिहार

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