फंसरी में जीव परेला - राजीव उपाध्याय

कबो-कबो अइसन होला
कि फंसरी में जीव परेला।

रहिया ओढन बासन-डासन
बाति सगरी हो जाला गुमानी
जइसे सरसों के फूल पर
लाही जाड़ा में गिरेला।

तूरि के खुँटा काहाँ ले जइब
चारू ओर चघोटब-रेघइब
फेर भइला पऽ सँझवत
मन डहरी घर के धरेला।

गइयो हँ भँइसियो हँ, सभे हँ
इहे जिनगी में घोराइल
कि बा फाँस गजबे कसाइल
कि अँखिया से लोर के रेला।
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लेखक परिचय:-
नाम: राजीव उपाध्याय
पता: बाराबाँध, बलिया, उत्तर प्रदेश
लेखन: साहित्य (कविता व कहानी) एवं अर्थशास्त्र
संपर्कसूत्र: rajeevupadhyay@live.in
दूरभाष संख्या: 9650214326
फेसबुक: https://www.facebook.com/rajeevpens
बेवसाइट: https://www.rajeevupadhyay.in/




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