न्याय - तारकेश्वर राय 'तारक'

आज रमेशर माटसाहब हाली हाली छवर धइले टीसन की ओर लपकत बढ़त जात रहन। काहें की नौ बजिया वाली गाड़ी पकड़े के बा इजलास पहुँचे के बा टाइम से। आजु पाकड़ के दखिन वाला खेत के मालिकाना हक के फैसला आवे वाला बा।

"गोड़ लागतानी ये गुरु जी, आनी गावें जा तानी का?" बिसुनी कपारे पर बोझा लिहले रूकले ना चलत चलत पुछले।

"हँ ये बिसुनी इजलास जा तानी। आज फैसला न हऽ? सिद्धि बाबा की कृपा होइ त जीत हमरे होइ। साँझी के मिलब।"

माट साहब के खेत रामबदन सिंह जबरी कब्जा कऽ लिहले रहन। ओहि केस क फैसला आवे वाला बा आज बरिसो बाद।

तबले गाड़ी के आवाज सुनी के माट साहब चिहुँक के आवाज के दिशा में तिकावे लगलन। रामबदन सिंह आपन लइका बबलुवा के साथे आवत रहलन। उनका के देखते देहि में आगी लाग गइल माटसाहब के।

बबलुवा गाड़ी रोकलस। "माटसाहब परनाम, आई गाड़ी में बइठ जाइ, कोर्ट ही जाएके बा नऽ?"
 
"हम ना बईठब जा जा तोहन लोग", रमेशर माटसाहब खिसिया के बोललन।

हँसत बबलुवा आगे बढ़ गइल। रामबदन सिंह के हँसी माटसाहब के खीस के अउरी बढ़ा देहलस।

समय से माटसाहब इजलास पहुंची गइलन। पाड़े जी ओकील साहब से बात कइला के बाद जा के बइठ गइलन।

सही समय पर कार्यवाही शुरू भइल। जज साहब आपन फैसला सुना देहले अउरी ओह फैसला पर जीते वाला आ हारे वाला दुनो ओकील के दस्तख़त भइला के बाद जीते वाला रामबदन सिंह के चेहरा कमल नियन खिल गइल। हारे वाला गोल के ओकील पाड़े जी रमेशर माटसाहब से कहलन - बहुते दुःख भइल माटसाहब राउर केस हम जीता ना पवनी अउर बिना जबाब सुनले पान मुहँ में चबात अपना टेबुल की ओर बढ़ी गइलन। रमेसर माटसाहब के चेहरा पर गरीबी बर्बादी और बेबसी के भाव आपन डेरा जमवले रहे। इंसाफ के बिकात देख आँख लोरा गईल रहे। कुल्हिये धुँधरावन लऊके लागल। बरिसो के आस छन भर में टुकि-टुकि होके छीटा गइल रहे। ओकील ख़ातिर क्रूरता के भाव उतीरा गईल उनका चेहरा पर। 'हेतना महंगा अउरी बड़का ओकील कइसन बोगस बहस कईलस?'

"अरे ईयार! रमेशर माटसाहब के हरला के हमरा बड़ा दुःख बा। अगर राउर दबाव ना रहीत न रायसाहब त रामबदन सिहं कबो ई केस ना जीत पवतन।" हारेवाला गोल के ओकील जीते वाला ओकील से कहलन। "उ त ठीक बा पाड़े जी, लेकिन हरही ख़ातिर रवुरा के पचास हजार नगद भेटाईल बा। रवुआँ काहें दुखी बानी? केतने रमेशर मास्टर के रवुआँ एहि तरह हरववले बानी। चानी कांटी महाराज।" सुनी के पाड़े जी मुस्की काटत हलिये खाइल पान के खिल्ली के ढेरकुल ले मुँहे में बटोराइल पिक के लापरवाही से एगो कोना में थुकि दिहले। ओह पिक के नीचे ना जाने केतना बेकसूर चिउटी के अखड़ेरे जान चल गईल आ जवन बाँचल रहनी सऽ उ जी जान से येह मुसीबत से बाँचे के कोशिश में बिलबिलाये लगली सऽ।

----------------------------

लेखक परिचय:-
नाम: तारकेश्वर राय 'तारक'
सम्प्रति: उप सम्पादक - सिरिजन (भोजपुरी) तिमाही ई-पत्रिका
गुरुग्राम: हरियाणा

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.